दैनिक समाज जागरण, संवाददाता, बिकाश
ईचागढ़ (कुकड़ू) : कुकड़ू प्रखंड के चौकेगारिया गांव में आदिवासी समाज का प्रमुख वसंत पर्व सरहुल पूरे पारंपरिक रीति-रिवाज और सामूहिक उल्लास के साथ मनाया गया। गांव में सुबह से ही उत्सवी माहौल रहा और प्रकृति पूजा के इस पर्व ने सामाजिक एकजुटता की नई मिसाल पेश की।
सरहुल को झारखंड सहित पूर्वी भारत के विभिन्न राज्यों में आदिवासी नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व साल (सखुआ) वृक्ष में नई कोपलों के आगमन के साथ प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक माना जाता है। जल, जंगल और जमीन के प्रति आस्था व्यक्त करते हुए ग्रामीणों ने विधिवत पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना की।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्व जिला परिषद उपाध्यक्ष अशोक साव ने कहा कि सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ आदिवासी समाज के अटूट संबंध का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने इसे पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक भाईचारे का प्रेरक पर्व बताया।
पूजा-अनुष्ठान के बाद मांदर की थाप पर पारंपरिक नृत्य और गीतों की मनमोहक प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को उल्लासमय बना दिया। युवक-युवतियों के साथ ग्रामीणों ने पारंपरिक वेशभूषा में सामूहिक नृत्य किया। अतिथि भी इस उत्साह में शामिल होकर मांदर की ताल पर झूमते नजर आए।
मौके पर उप मुखिया मनोज मछुआ, कार्तिक सिंह पतार, बादल महतो, डुंपा हांसदा, नारायण हांसदा, सुभाष चंद्र सोरेन, सुधीर बास्के, दशरथ हांसदा समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे। पूरे गांव में सरहुल को लेकर श्रद्धा, उत्साह और सांस्कृतिक गर्व का वातावरण बना रहा।
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