*ऑटो-ट्रांसप्लांटेशन तकनीक से 30 वर्षीय महिला को मिली राहत, छह महीने के फॉलो-अप में सफल रहा दांत का प्रत्यारोपण**
**मुरादाबाद।** तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी (टीएमयू) के डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर ने आधुनिक दंत चिकित्सा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। कॉलेज के कंजर्वेटिव डेंटिस्ट्री एंड एंडोडॉन्टिक्स विभाग के विशेषज्ञों ने अपनी चिकित्सकीय दक्षता और आधुनिक तकनीक का परिचय देते हुए 30 वर्षीय महिला मरीज की खराब हो चुकी पहली दाढ़ की जगह उसकी अपनी अक्ल दाढ़ का सफल प्रत्यारोपण किया। इस प्रक्रिया को *ऑटो-ट्रांसप्लांटेशन* कहा जाता है, जो उपयुक्त मरीजों के लिए पारंपरिक डेंटल इम्प्लांट का एक प्राकृतिक और किफायती विकल्प बन सकती है।
मरीज परवीना बेगम दाईं ओर की पहली दाढ़ में चबाने संबंधी गंभीर परेशानी के साथ विभाग पहुंची थीं। जांच और डेंटल एक्स-रे में दाढ़ अत्यधिक खराब पाई गई, जिसके बाद उसे बचाना संभव नहीं माना गया। विशेषज्ञों ने विस्तृत परीक्षण के बाद मरीज की तीसरी दाढ़ यानी अक्ल दाढ़ को प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त पाया। मरीज और उनके परिजनों की सहमति से सर्जरी की योजना तैयार की गई।
सर्जरी के दौरान खराब दाढ़ को निकालने के बाद अक्ल दाढ़ को उसकी जड़ों के आसपास मौजूद पीरियोडॉन्टल लिगामेंट को सुरक्षित रखते हुए निकाला गया। इसके बाद उसे खाली स्थान पर स्थापित कर टांकों और स्प्लिंट की सहायता से स्थिर किया गया। यह तकनीक मरीज के अपने प्राकृतिक दांत का उपयोग करती है, जिससे उपयुक्त परिस्थितियों में दांत की प्राकृतिक संरचना और आसपास के ऊतकों को बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
**छह महीने बाद भी स्वस्थ और स्थिर मिला प्रत्यारोपित दांत**
इस उपचार की सफलता का आकलन करने के लिए मरीज को नियमित फॉलो-अप पर रखा गया। छह महीने की जांच में प्रत्यारोपित दांत मसूड़ों और हड्डी के साथ स्थिर, स्वस्थ और कार्य करने की स्थिति में पाया गया। विशेषज्ञों के अनुसार, सही मरीज का चयन, डोनर दांत की उपयुक्त बनावट, सटीक सर्जिकल तकनीक और पीरियोडॉन्टल लिगामेंट का संरक्षण इस प्रक्रिया की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यह सफल प्रक्रिया प्रो. रोहित कुमार शर्मा के मार्गदर्शन में संपन्न हुई। सर्जिकल टीम में डॉ. अंजलि शर्मा, डॉ. साक्षी गर्ग और डॉ. हर्षित सेठी जैन शामिल रहे। डेंटल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. प्रदीप तांगड़े और वाइस प्रिंसिपल डॉ. अंकिता जैन ने इस उपलब्धि पर विभागाध्यक्ष डॉ. नवीन छाबड़ा सहित पूरी टीम को बधाई दी।
टीएमयू डेंटल कॉलेज की यह उपलब्धि दर्शाती है कि आधुनिक दंत चिकित्सा में मरीज के अपने प्राकृतिक दांत को सुरक्षित रखने और उसका पुनः उपयोग करने वाली तकनीकें भी महत्वपूर्ण विकल्प बन रही हैं। उपयुक्त मामलों में ऑटो-ट्रांसप्लांटेशन कृत्रिम इम्प्लांट की तुलना में किफायती, जैविक और अपेक्षाकृत कम चीर-फाड़ वाला विकल्प हो सकता है। इस सफल उपचार के माध्यम से टीएमयू के विशेषज्ञों ने उन्नत दंत चिकित्सा और मरीज-केंद्रित उपचार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित किया है।

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