जीवन को मंगलमय बनाने के लिए भगवान शिव की आराधना अत्यंत आवश्यक है

ब्यूरो चीफ़ विजय कुमार अग्रहरी। समाज जागरण

सोनभद्र। पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य श्री स्वामी नारायणानंद तीर्थ जी महाराज काशी से पधारे हुए अनन्त श्री विभूषित काशी धर्म पीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य श्री स्वामी नारायणानंद तीर्थ जी महाराज ने नर्मदा बिहार गिरिजाशंकर ग्रीन रेजिडेंसी,ओरगाई रोड बुड़हर कला सोनभद्र में चल रहे श्री शिव महापुराण कथा तथा श्री रुद्र महायज्ञ के पंचम दिवस मेंजगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानन्दतीर्थ जी ने बताया कि किसी भी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि जहां आप जा रहे है वहां आपका, अपने इष्ट या अपने गुरु का अपमान हो। यदि ऐसा होने की आशंका हो तो उस स्थान पर जाना नहीं चाहिए। चाहे वह स्थान अपने जन्म दाता पिता का ही घर क्यों हो। कथा के दौरान सती चरित्र के प्रसंग को सुनाते हुए भगवान शिव की बात को नहीं मानने पर सती के पिता के घर जाने से अपमानित होने के कारण स्वयं को अग्नि में स्वाह होना पड़ा।राजा दक्ष ने शिव जी का अपमान करने के लिए एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया है। उस यज्ञ में उन्होंने सभी देवताओं को बुलाया, लेकिन भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया, क्योंकि वे उन्हें नहीं पसंद करते थे। शिव की महिमा से अंजान दक्ष ने यह कदम उठाया था। यज्ञ न बुलाने के बाद देवी सती अपने पिता दक्ष प्रजापति के इस अनुष्ठान में पहुंच गई, और दक्ष द्वारा शिव जी का अपमान करते हुए कहा कि वो इस सभा में आने योग्य नहीं है वो मैं ब्रह्मा जी के कहने से मैं तुम्हारा विवाह उससे करा दिया अपने पति का अपमान होने पर क्रोधित होके उन्होंने उसी यज्ञ में खुदको आत्मदाह कर लिया।इसके बाद शिव जी ने क्रोध में आकर राजा दक्ष के यज्ञ को विध्वंश करके उनके सिर को काट दिया। बाद में देवताओं के अनुरोध करने पर उन्होंने राजा दक्ष को जीवनदान दिया और उनके शरीर पर बकरे का सिर लगा दिया, इसपर ब्रह्मा जी ने सवाल किया कि आखिर बकरे का सिर ही क्यों ? हाथी, शेर, या किसी अन्य प्राणी का क्यों नहीं ? इसका जवाब देते हुए शिव जी ने कहा कि नन्दीश्वर ने दक्ष को यह श्राप दिया था कि अगले जन्म में वह बकरा बनेगा। इसलिए उन्होंने बकरे का सिर मंगाया और दक्ष के शरीर में जोड़कर उसे जीवित कर दिया।
इसके बाद दक्ष को अपनी गलती का एहसास हुआ और उनका घमंड हमेशा – हमेशा के लिए समाप्त हो गया। फिर उन्होंने देवों के देव महादेव से क्षमायाचना की। कथा स्थल में यजमानों सहित नगर के गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई। साथ ही बता दिया जाए कि कथा में मुख्य सह आयोजक श्री पुण्डरीक कुमार पाण्डेय सपत्नीक पूनम देवी यज्ञ के यजमान बंशीधर दुबे सपत्नीक सावित्री दुबे, राजेश प्रसाद मिश्र सपत्नीक सीमा देवी , रविन्द्र प्रसाद मिश्र सपत्नीक विद्यावती मिश्रा, अरुण कुमार दुबे, अनिल दुबे, हरिश्चंद शुक्ल, गुड्डू पाण्डेय, विनोद तिवारी, हितेश पाण्डेय, अनुज पाण्डेय, गोपाल स्वरूप पाठक,राजेश चौरसिया, ओमप्रकाश, बी ए न शर्मा,संजू शर्मा, मनोज गौड़, रोशन पटेल, आदि समस्त भक्त जनों की उपस्थिति रही।

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