वीरेंद्र चौहान, समाज जागरण ब्यूरो किशनगंज।
टेढ़ागाछ आज़ादी के 79 साल बाद भी विकास की धारा बहादुरगंज विधानसभा क्षेत्र के टेढ़ागाछ प्रखंड अंतर्गत चिल्हनियां पंचायत स्थित सुहिया रेतुआ नदी तक नहीं पहुंच पाई है। यहां के हजारों ग्रामीण आज भी नाव और बांस-बल्ली से बने चचरी पुल के सहारे जीवन जीने को मजबूर हैं। सुहिया रेतुआ नदी पर स्थायी आरसीसी पुल निर्माण की मांग दशकों से की जा रही है, लेकिन अब तक सरकार और प्रशासन के स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं की गई। नतीजतन यह इलाका आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है।ग्रामीणों का कहना है कि हर चुनाव में जनप्रतिनिधि पुल निर्माण का वादा करते हैं, पर जीत के बाद यह मुद्दा फिर गुमनामी में चला जाता है।

रेतुआ नदी को पार करना लोगों के लिए रोजमर्रा का संघर्ष बन चुका है। बांस और रस्सियों के सहारे तैयार अस्थायी चचरी पुल से लोगों का आना-जाना होता है, जो बरसात के मौसम में बहकर खत्म हो जाता है। तब ग्रामीणों को नाव या गले तक पानी पार कर दूसरी ओर पहुंचना पड़ता है। स्कूल जाने वाले बच्चों, बीमार मरीजों और किसानों के लिए यह रास्ता जीवन और मौत के बीच की डगर बन जाता है।स्थानीय निवासी मोहम्मद रहमतुल्लाह, अनवर आलम, भोला मांझी और सुनील यादव बताते हैं कि बरसात के समय नदी में उफान आने पर संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। मरीजों को अस्पताल ले जाना असंभव हो जाता है। कई बार आपात स्थिति में जान गंवाने तक की नौबत आ चुकी है। किसान भी अपनी उपज और सामान बाजार तक नहीं पहुंचा पाते, जिससे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।ग्रामीणों ने बताया कि इस पुल के निर्माण के लिए अब तक कई बार आवेदन दिए गए, स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई गई, पर हर बार उन्हें केवल आश्वासन मिला। ग्रामीणों का कहना है कि आज़ादी के बाद से अब तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कई विधायकों और सांसदों ने किया, लेकिन किसी ने भी सुहिया रेतुआ नदी पर पुल निर्माण को प्राथमिकता नहीं दी।
चिल्हनियां पंचायत के पूर्व मुखिया मयानंद मंडल ने बताया कि यह इलाका प्रखंड मुख्यालय और किशनगंज जिला से सीधा जुड़ाव न होने के कारण विकास की दौड़ में लगातार पिछड़ता जा रहा है। स्कूली बच्चों को शिक्षा, किसानों को बाजार और मरीजों को इलाज — हर जरूरत के लिए नदी पार करना पड़ता है। यह पुल न केवल एक मार्ग होगा बल्कि हजारों लोगों की जीवनरेखा साबित होगा।ग्रामीणों ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन से जल्द से जल्द आरसीसी पुल निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि अबकी बार भी इस मांग की अनदेखी की गई, तो वे बड़े आंदोलन का रास्ता अपनाने को विवश होंगे। लोगों ने स्पष्ट कहा कि अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहिए।
79 साल से अधूरी उम्मीदों का यह पुल सीमांचल के विकास की तस्वीर पर एक गहरा सवालिया निशान है। जहां देश चांद पर पहुंच गया, वहीं सुहिया रेतुआ नदी के इस पार लोग आज भी चचरी और नाव के सहारे जिंदगी गुजार रहे हैं। ग्रामीणों ने दो टूक कहा कि अब और इंतज़ार नहीं — उन्हें सुरक्षित, स्थायी और सम्मानजनक आवागमन का अधिकार चाहिए।



