पांच राज्य विधानसभा के चुनाव में इतिहास सिर्फ बंगाल में ही नहीं बदला बल्कि तमिलनाडु और केरलम में भी बदला है, किंतु सबसे ज्यादा चर्चा बंगाल के चुनाव की. होना भी चाहिए क्योंकि अब बंगाल में दीदी ममता का राज गया और दादा अमित शाह का राज आ गया है. बंगाल का चुनाव किसी बंगाली नेता के नाम पर नहीं जीता गया, इसीलिए अब यहाँ जो राज होगा, वो गुजराती होगा, जिसे आप दादाबाद कह सकते हैं.

पांज राज्यों में से दो में पार्टी की सरकार बचाने और बंगाल जीतने के बाद भाजपा के एकमेव पूर्णकालिक प्रचारक और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की जबान पर 18 अप्रैल को बैठी कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी और सपा का ही नाम था. 18 अप्रेल को 131 वां संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने में नाकाम प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को महिला आरक्षण विधेयक की भ्रूण हत्या का आरोपी बताया कर श्राप दिया था और 4 मयी को ठीक 17 दिन बाद भी कांग्रेस और डीएमके, टीएमसी तथा सपा को कोसा. आज तो कांग्रेस को प्रधानमंत्री ने शहरी नक्सलियों का गिरोह तक कह डाला.प्रधानमंत्री के दिमाग़ से कांग्रेस का भूत उतरने का नाम ही नही ले रहा. वे बंगाल जीतकर भी तनाव में हैं.
पांचों राज्यो में से केवल तमिलनाडु का चुनाव परिणाम मुझे चमत्कृत करने वाला लगा. असम और पांडीचेरी के नतीजों में किसी की दिलचस्पी नहीं थी. केरल में भाजपा नाम के लिए चुनाव मैदान में थी. असली रण तो बंगाल में हो रहा था. बंगाल में न वामपंथी प्रतिद्वंदी थे न कांग्रेस. फिर भी चुनाव जीतने के लिए भाजपा को पूरी केंद्र सरकार के साथ ही केंचुआ, ईडी, सीबीआई और सबसे बडी अदालत के अलावा दो लाख से भी ज्यादा अर्धसैनिक बल तैनात करना पडे.इतनी ताकत तो अमेरिका को होर्मुज स्ट्रेट में नहीं लगाना पडी.
मेरे स्मरण में देश में किसी सत्तारूढ दल को एक सूबा जीतने के लिए इतनी ताकत लगाना पडी हो. बंगाल जीतने की भाजपा की खुशी कांग्रेस ने केरल जीत कर किरकिरी कर दी. ये कसक भाजपा मुख्यालय से देश को संबोधित कर रहे प्रधानमंत्री के चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी. वे इसे छिपा नहीं सके. छिपा भी नहीं सकते थे क्योंकि वे साम, दाम, दंड, भेद के बाद भी कांग्रेस को नहीं हरा पा रहे हैं. जब तक कांग्रेस वजूद में है मोदीजी का चक्रवर्ती सम्राट बनने का सपना अधूरा है.
मैं भाजपा के देवतुल्य कार्यकर्ताओं के साथ ही जी तोड नही बल्कि हाड तोड श्रम करने वाले प्रधानमंत्री, गृहमंत्री को बंगाल, असम और पांडुचेरी जीतने की बधाई दे रहा हूँ लेकिन कोई खुश नजर नहीं आ रहा. समूची भाजपा कांग्रेस के केरलम की सत्ता मिलने से आहत है. एक राष्ट्रीय दल को जो भाजपा से सौ साल पुरानी है को शहरी नक्सलियों का गिरोह कहकर प्रधानमंत्री जी ने एक बार फिर प्रमाणित कर दिया है कि भाषा के मामले में उनका दारिद्रय, मालिन्य खत्म ही नहीं हो रहा.
विधानसभा का हर चुनाव एक संदेश देता है. इन पांच राज्यों के चुनाव ने भी संदेश दिया है कि भाजपा शिवसेना को खा चुकी है. बीजद को निगल चुकी. जदयू को निगल गयी.अकालीदल को नहीं छोडा. ये फेहरिश्त लंबी है. इसमें कितने नाम और जोडे जाएंगे, भाजपा के अलावा कोई नहीं जानता.कल तमिलनाडु और केरलम भी इसी तरह क्षेत्रीय दलों के हाथों से जाएगा.
पिछले एक दशक में भारतीय चुनाव प्रणाली और दलबदल कानून में जो बिगाड़ आया है उसे देखते हुए कांग्रेस समेत अन्य क्षेत्रीय दलों की जिम्मेदारी बढ गई है. सभी दलों को अपने संगठनात्मक ढांचे, चुनाव लडने की तकनीक में आवश्यक तब्दीलियां करना पडेंगी अन्यथा जिन राज्यों में भाजपा सत्तारूढ हुई है, वहां से उसे बेदखल करना कठिन ही नहीं बल्कि असंभल हो जाएगा.
कांग्रेस के लिए ये आत्मावलोकन का सही समय है. अतीत में कांग्रेस जिन राज्यों से सत्ताच्युत हुई उनमें से कितने में वापस लौटी? या वापस लौटने में कांग्रेस को कितना वक्त लगा? ये तथ्य भी सामने रखा जाना चाहिए. कांग्रेस को मैंने, आपने बंगाल, बिहार,महाराष्ट्र,उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मप्र, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, पंजाब, असम, से उखडते देखा है.इनमें से कितने राज्यों में कांग्रेस की वापसी हुई?
बहरहाल बहस और विमर्श इस बात पर होना चाहिए कि भाजपा जीती कैसे और विपक्ष हारा कैसे? भाजपा की अभेद्य चुनाव रणनीति लगातार कामयाब कैसे हो रही है? इन सवालों के उत्तर न मिले तो आज कांग्रेस को अर्बन नक्सलियों का गिरोह कहा गया है,, कल हर गैर भाजपाई को अर्बन नक्सली कह कर जेलों में ठूंसा जा सकता है. इसलिए तैयार रहिये नये ध्रुवीकरण का सामना करने के लिए. तैयार रहो बुलडोजर न्याय के लिए, तैयार रहिए ऐसी ही दीगर चुनौतियों के लिए.क्योंकि हर नया चुनाव देश की विधानसभाओं को, लोकसभभा और राज्यसभा को असंतुलित करता दिखाई दे रहा है.
@ राकेश अचल



