शाहजहांपुर से बड़ी खबर : गरीब मजदूर और ठेले वाले की मेहनत पर संकट, प्रशासन की चुप्पी से उठे सवाल

समाज जागरण संवाददाता शाहजहांपुर

शाहजहांपुर। गरीब और मजदूर वर्ग की समस्याओं पर प्रशासन की चुप्पी अब सवालों के घेरे में है। बीते दिनों दो ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।

पहला मामला : मजदूर सुखमल की बेबसी

हरदोई जिले के ग्राम रायपुर गुलरिया निवासी सुखमल पुत्र सदानंद रोज़ी-रोटी के लिए लालबाग चौराहे पर स्थित महेंद्र ढाबा (मालिक – महेंद्र राठौर) पर लंबे समय से काम कर रहा था। उसकी आमदनी सिर्फ बर्तन धोने और छोटे-मोटे कामों से ही चलती है।

जानकारी के अनुसार, ढाबा मालिक अब अपना ढाबा दूसरी जगह शिफ्ट कर रहा है। इस दौरान जब सुखमल ने अपनी मेहनत की बकाया मजदूरी मांगी तो मालिक ने पैसा देने से साफ इनकार कर दिया और कथित तौर पर धमकी भी दी।

पीड़ित ने न्याय की उम्मीद में थाना रामचंद्र मिशन के दरोगा सत्येंद्र कुमार से शिकायत की। वहीं मौजूद एक होमगार्ड ने उससे ₹50 लेकर प्रार्थना पत्र भी लिखा। लेकिन तीन दिन से अधिक बीत जाने के बाद भी पुलिस की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हुई। सुखमल का कहना है कि उसने दरोगा जी को कई बार फोन किया, मगर हर बार उसे टाल दिया गया।

आज जब ढाबा मालिक ढाबा खाली कर चला गया है, तो गरीब सुखमल को अपनी मेहनत की कमाई वापस मिलने की उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी है।

दूसरा मामला : ठेले वाले का नुकसान

इसी थाना क्षेत्र में लगभग 5-6 दिन पूर्व हरदोई बाईपास पर एक गरीब ठेले वाले का खोखा धोखे से आग के हवाले कर दिया गया। पीड़ित ने थाना रामचंद्र मिशन में प्रार्थना पत्र दिया, लेकिन अब तक किसी प्रकार की सुनवाई नहीं हुई।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस गली में ठेले वाला अपना खोखा लगाता था, वहां सीसीटीवी कैमरे भी लगे हैं। अगर पुलिस चाहती तो आसानी से दोषियों तक पहुंच सकती थी। मगर अब तक कोई जांच या कार्रवाई न होने से गरीब ठेले वाला अपना नुकसान लेकर दर-दर भटक रहा है।

उसका कहना है कि इस घटना में उसका बहुत सा सामान जलकर राख हो गया, जिससे परिवार के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

उठते सवाल

इन दोनों मामलों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं—

आखिर गरीब मजदूर और ठेले वाले की मेहनत की कमाई पर डाका डालने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

जब पीड़ित थाने में प्रार्थना पत्र देकर न्याय की गुहार लगाते हैं, तो उनकी सुनवाई क्यों नहीं होती?

क्या गरीबों की शिकायतों को दरकिनार करना ही अब व्यवस्था की नियति बन चुकी है?

गरीबों के हक और न्याय की लड़ाई में प्रशासन की चुप्पी ने आमजन को निराश कर दिया है। समाज पूछ रहा है—“अगर गरीब की नहीं सुनी जाएगी, तो आखिर सुना किसकी जाएगी?”

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