google-site-verification: google2b21991adbe5cec3.html

ब्रिक्स की ‘गूंज’  वाशिंगटन से इस्लामाबाद तक खलबली

अजय कुमार,  वरिष्ठ पत्रकार
लखनऊ ( उ. प्र.)

नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मंच पर जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक साथ कैमरे के सामने आए, तो वाशिंगटन से लेकर पश्चिमी राजधानियों तक भू-राजनीतिक हलचल तेज होना लाजिमी था। दुनिया के इन तीन बड़े देशों के शीर्ष नेताओं का एक फ्रेम में दिखना इस बात का स्पष्ट संदेश है कि वैश्विक राजनीति अब एकध्रुवीय यानी अमेरिकी नियंत्रण वाली नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर पूरी मजबूती से बढ़ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका फर्स्ट और आक्रामक व्यापारिक नीतियों के दौर में यह तस्वीर व्हाइट हाउस के रणनीतिकारों के लिए एक बड़ी चेतावनी की तरह है। इससे अमेरिका को साफ संदेश जाता है कि वैश्विक दक्षिण यानी ग्लोबल साउथ के देश अब अमेरिकी दबाव या एकतरफा प्रतिबंधों के आगे घुटने टेकने को तैयार नहीं हैं, और वे अपने आर्थिक व कूटनीतिक हितों के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएं तलाशने में जुट चुके हैं।

ट्रम्प प्रशासन की मनमानी और दुनिया भर में उसकी दादागिरी पर लगाम कसने के लिहाज से यह एकजुटता एक वैचारिक और आर्थिक ढाल का काम करती है। जिस प्रकार अमेरिका ईरान और अन्य विकासशील देशों के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाए हुए है और वैश्विक वित्तीय तंत्र का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में करता है, उससे निपटने के लिए ब्रिक्स मंच का मजबूत होना जरूरी था। हालांकि, यह भी सच है कि केवल एक सम्मेलन से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की कार्यशैली रातों-रात नहीं बदल जाएगी, क्योंकि अमेरिका की सैन्य और आर्थिक ताकत अभी भी व्यापक है। इसके बावजूद, जब रूस, चीन और भारत जैसे देश एक मंच पर खड़े होकर अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को कम करने और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की बात करते हैं, तो ट्रम्प की उन धमकियों का असर कम होने लगता है जो वे अक्सर दूसरे देशों को पाबंदी लगाने के लिए देते हैं। ईरान जैसे देशों के मुद्दे पर, जो इस समय अमेरिकी आक्रामकता का सामना कर रहे हैं, ब्रिक्स का यह विस्तार और एकजुट रुख यह बताता है कि अमेरिका चाहकर भी पूरी दुनिया को अपनी मर्जी के मुताबिक हांक नहीं सकता।

भारत के दृष्टिकोण से इस कूटनीतिक निकटता और संतुलन के कई दूरगामी और व्यावहारिक फायदे हो सकते हैं। भारत एक तरफ पश्चिमी देशों और अमेरिका के साथ क्वाड जैसी साझेदारियों में शामिल है, तो दूसरी तरफ ब्रिक्स के जरिए रूस और चीन के साथ भी संवाद बनाए हुए। इसे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की बड़ी जीत माना जा सकता है। ब्रिक्स के मंच पर रहने से भारत को रूस से ऊर्जा सुरक्षा (कच्चा तेल) सुनिश्चित करने में मदद मिलती है, जो अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद देश की आर्थिकी को संभाल कर रखती है। इसके अलावा, ग्लोबल साउथ के निर्विवाद नेता के रूप में भारत विकासशील देशों की आवाज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से रख पा रहा है। आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता, उन्नत तकनीक, आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख और डिजिटल अर्थव्यवस्था में सहयोग जैसे मुद्दे भारत के आर्थिक विकास को नई गति दे सकते हैं। भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह किसी भी एक महाशक्ति के खेमे में बंधने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए सबके साथ संतुलित संबंध रख सकता है।

इन भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच दुनिया भर में यह सवाल सबसे ज्यादा प्रासंगिक बना हुआ है कि क्या कभी एशिया की दो महाशक्तियों यानी भारत और चीन के बीच के रिश्ते पूरी तरह सामान्य हो सकते हैं। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और पिछले कुछ वर्षों में उपजा अविश्वास गहरा है, जिसे रातों-रात नहीं मिटाया जा सकता। इसके बावजूद, कूटनीति में स्थायी शत्रुता या मित्रता जैसा कुछ नहीं होता, केवल स्थायी हित होते हैं। जब भारत और चीन वैश्विक मंचों जैसे ब्रिक्स या शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) पर मिलते हैं, तो वे इस बात को भली-भांति समझते हैं कि आपसी टकराव से केवल पश्चिमी ताकतों को फायदा पहुंचता है। हालिया मुलाकातों और व्यापारिक स्तर पर हो रही वार्ताओं से यह संकेत जरूर मिलते हैं कि दोनों देश कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर तनाव को एक निश्चित दायरे में प्रबंधित करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, चीन की विस्तारवादी फितरत और सीमा पर जारी संप्रभुता के मुद्दों को देखते हुए भारत पूरी तरह से आश्वस्त होकर आंखें मूंदने की स्थिति में नहीं है। इसलिए, चीन के साथ रिश्ते पूरी तरह सामान्य होना इस बात पर निर्भर करेगा कि बीजिंग भारत की संप्रभुता और सुरक्षा चिंताओं का कितना सम्मान करता है, लेकिन वर्तमान हालात यह जरूर बताते हैं कि कूटनीतिक बाध्यताएं दोनों देशों को बातचीत की मेज पर बनाए रखने के लिए मजबूर कर रही हैं।

उधर, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में रूस और चीन के शीर्ष नेतृत्व की सक्रियता और भारत की मजबूत उपस्थिति ने पड़ोसी देश पाकिस्तान के रणनीतिक हलकों में भी गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। पाकिस्तान लंबे समय से खुद को चीन का ऑल-वेदर फ्रेंड और क्षेत्र में बीजिंग का सबसे भरोसेमंद मोहरा मानता आया है, लेकिन ब्रिक्स मंच पर चीन और रूस द्वारा भारत के साथ जिस तरह से कूटनीतिक समन्वय और वैश्विक समीकरणों पर चर्चा की गई है, उसने इस्लामाबाद के उस भ्रम को तोड़ दिया है जिसमें वह समझता था कि बीजिंग केवल उसके हितों को प्राथमिकता देगा। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है और वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) तथा पश्चिमी देशों की मदद के लिए लगातार जूझ रहा है, जबकि दूसरी ओर ब्रिक्स वैश्विक वित्तीय तंत्र और डॉलर के वर्चस्व का विकल्प तलाशने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में, जब चीन और रूस भारत के साथ एक ही मंच पर ग्लोबल साउथ के नेतृत्व और आर्थिक सहयोग की बात करते हैं, तो पाकिस्तान को यह डर सताने लगता है कि वैश्विक भू-राजनीति के बदलते इस दौर में उसका पारंपरिक महत्व पूरी तरह से समाप्त न हो जाए। इसके अलावा, ईरान और मध्य एशिया से जुड़े समीकरणों में भारत की बढ़ती कूटनीतिक पहुंच से पाकिस्तान और अधिक अकेला महसूस करने लगा है, क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंधों और अंदरूनी राजनीतिक अस्थिरता के बीच इस्लामाबाद के पास न तो कोई ठोस आर्थिक विकल्प बचा है और न ही कोई ऐसा वैश्विक मंच जहां उसकी बात को उस तवज्जो के साथ सुना जाए जैसी वह उम्मीद करता है। ब्रिक्स देशों की इस बढ़ती निकटता ने पाकिस्तान को यह अहसास करा दिया है कि चीन और रूस के लिए राष्ट्रीय हित और वैश्विक बाजार पाकिस्तान की तुनकमिजाजी और भारत विरोध की राजनीति से कहीं ज्यादा बड़े हैं, जिससे उसकी विदेश नीति के समक्ष एक बड़ा अस्तित्वगत संकट खड़ा हो गया है।


Discover more from समाज जागरण

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

🛍️ Today’s Best Deals

(Advertisement)