आस्था का अर्घ्य व उगते सूर्य को नमन के साथ चैती छठ संपन्न

घाटों पर उमड़ा श्रद्धा का जनसैलाब

समाज जागरण पटना जिला संवाददाता:- वेद प्रकाश

पटना/नहाय-खाय से शुरू हुआ चार दिवसीय चैती छठ महापर्व बुधवार की सुबह उदीयमान भगवान भास्कर को द्वितीय अर्घ्य अर्पण के साथ संपन्न हो गया। राजधानी के गंगा घाटों से लेकर मोहल्लों के पार्कों और घरों की छतों तक, हर ओर ‘कांच ही बांस के बहंगिया’ के पारंपरिक गीतों की गूंज और भक्ति का उल्लास दिखाई दिया। 36 घंटे के कठिन निर्जला उपवास के बाद व्रतियों ने पारण कर व्रत का समापन किया। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस वर्ष चैती छठ विशेष शुभ संयोगों में मनाया गया। मंगलवार को व्रतियों ने रोहिणी नक्षत्र और प्रीति योग के बीच अस्ताचलगामी सूर्य को पहला अर्घ्य दिया।

वहीं, बुधवार सप्तमी के दिन मृगशिरा नक्षत्र और आयुष्मान योग के दुर्लभ अवसर पर उगते सूर्य की उपासना की गई। श्रद्धालुओं ने तांबे के पात्र से जल में रक्त चंदन, लाल फूल और गुड़ मिलाकर अर्घ्य दिया। धार्मिक मान्यता है कि इस विधि से पूजन करने से आयु, आरोग्य, यश और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। बुधवार तड़के से ही घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटने लगी थी। जैसे ही सूर्य की पहली किरण दिखाई दी, व्रतियों ने दूध और जल से अर्घ्य देकर संतान के सुख और परिवार की समृद्धि की कामना की। अर्घ्य के पश्चात घाटों पर ही प्रसाद वितरण का सिलसिला शुरू हुआ।

व्रतियों ने एक-दूसरे को सिंदूर और मंगल टीका लगाकर सुहाग और परिवार की रक्षा का आशीर्वाद लिया। इसके बाद शरबत और दूध ग्रहण कर 36 घंटे के निर्जला उपवास का पारण किया गया। स्कंद पुराण और प्रतिहार षष्ठी के संदर्भों का उल्लेख करते हुए पंडितों ने बताया कि यह व्रत न केवल धार्मिक है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी आरोग्यता प्रदान करने वाला है। राजा प्रियव्रत की कथा का स्मरण करते हुए भक्तों ने इस कठिन साधना को पूरा किया। प्रशासन की ओर से घाटों पर सुरक्षा और सफाई के पुख्ता इंतजाम थे। कई स्थानों पर कृत्रिम तालाबों की व्यवस्था की गई थी, जिससे बुजुर्गों और बच्चों को काफी सहूलियत हुई। पूरे बिहार में यह महापर्व शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न हुआ, जो समाज में अनुशासन और अटूट श्रद्धा का अनूठा उदाहरण पेश कर गया।

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