समाज जागरण सिंगरौली (मध्य प्रदेश)। कोतवाली थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला खुटार चौकी इलाका आज कानून का नहीं, बल्कि रेत माफिया का गढ़ बन चुका है। ग्राम पिपरा झांपि में अवैध रेत उत्खनन अब किसी चोरी-छिपे होने वाली हरकत का नाम नहीं रहा, बल्कि यह खुला खेल है—दिन के उजाले में, खुलेआम, निर्भय होकर। देखने वाला हर आदमी देख रहा है, बस देखने से इनकार कर रही है तो केवल व्यवस्था।

सवाल साफ है—क्या खुटार चौकी कानून लागू करती है या कानून को ठेंगा दिखाने वालों को सुरक्षा कवच देती है?खुटार चौकी प्रभारी शीतला यादव के क्षेत्र में अवैध उत्खनन जिस निर्लज्जता से चल रहा है, उसने यह विश्वास पुख्ता कर दिया है कि या तो प्रशासन इस माफिया गिरोह से डरता है, या फिर इस काले खेल में कहीं न कहीं से मौन सहमति मिली हुई है। जब कभी कागज़ी कार्रवाई का दिखावा होता है, उसे “मुखबिर की सूचना” बता दिया जाता है।
अब सवाल यह है—जब पूरा क्षेत्र चीख-चीखकर बता रहा है, मीडिया लगातार उजागर कर रहा है, तो फिर यह “मुखबिर सिस्टम” अचानक बहरा क्यों हो गया?ग्रामीण बताते हैं कि रात होते ही ट्रैक्टरों की कतारें खुलकर कानून का मज़ाक उड़ाती हुई निकलती हैं। सूत्र बताते हैं कि ₹25,000 महीना “एंट्री फीस” तय है, जो सीधे खुटार चौकी तक पहुंचने की बात खुद माफिया करते हैं।
सीमेंट-सरिया कारोबारियों से भी वसूली। जो पैसे दे, वो वआईपी प्रोटेक्शन पाओ… जो न दे, उसके ट्रैक्टर जब्त, मुकदमे, कार्रवाई। यह कानून नहीं, यह तो सीधा गुंडाराज है।खुटार चौकी क्षेत्र आज अपराधियों के लिए ‘ब्लैक स्पॉट’ नहीं, बल्कि ‘सेफ ज़ोन’ घोषित इलाके जैसा महसूस होता है। पुलिस का काम कानून बचाना होता है, लेकिन यहाँ कानून को नंगा करके परेड कराई जा रही है और सिस्टम चुप है—तो क्या इसे मिलीभगत कहा जाए, अक्षमता या फिर जानबूझकर की गई लापरवाही?अब सिंगरौली पुलिस अधीक्षक और मध्य प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री के सामने सीधी और सख्त मांग है—
या तो कानून को बचा लीजिए,
या फिर साफ कह दीजिए कि यहां जंगलराज मान्य है।यदि प्रशासन चाहे तो एक रात की कड़ी कार्रवाई में सच सामने आ सकता है, लेकिन चाहत और हिम्मत होनी चाहिए।
अगर इस खबर से किसी की असहजता बढ़ती है, तो बढ़े—
क्योंकि कानून से ऊपर न कोई था, न है और न रहेगा।
जिम्मेदारी प्रशासन की है और जवाब भी प्रशासन को ही देना होगा।



