नई दिल्ली : डूटा ने आज शिक्षको के सम्मान,सुरक्षा और न्यायपूर्ण सेवा शर्तों को लेकर कुलपति कार्यालय के गेट पर धरना प्रदर्शन किया। धरने में विभिन्न विश्वविद्यालयों के हजारों शिक्षको ने डूटा की मांग का समर्थन करते हुऐ शिक्षको के सुरक्षा सम्मान और न्याय पूर्ण मांग में अपना समर्थन दिया।
शिक्षको को संबोधित करते हुए, डूटा के अध्यक्ष प्रो. वी. एस. नेगी ने कहा कि शिक्षकों की सुरक्षा, गरिमा और सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। साथ ही साथ उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति को सफल बनाने के लिए यू.जी.सी.एफ की संरचना को व्यापक समीक्षा की तत्काल आवश्यकता है । इसको सही तरह से लागू नहीं करने के कारण ही शिक्षकों और छात्र दोनों प्रभावित है। प्रो. नेगी ने जोर देकर कहा कि पीएचडी/एम.फिल. इंक्रीमेंट जैसे बुनियादी सवाल भी शिक्षको के सामने है। पूर्ण पास्ट सर्विस काउंट जैसे मुद्दों को लेकर भी डूटा संजीदा है और जल्द ही धरना प्रर्दशन करेगी। डूटा के सचिव श्री बिमलेंदु तीर्थंकर ने सेवा शर्तों के गंभीर उल्लंघन को रेखांकित किया, पदोन्नति में लंबे समय तक देरी, अस्थायी शिक्षकों के लिए वेतन सुरक्षा और कॉलेज शिक्षकों के लिए डब्ल्यूयूएस स्वास्थ्य केंद्र की सुविधाओं । जैसे मुद्दे को उठाया। डूटा के उपाध्यक्ष भूपेंदर कुमार ने कहा कि ने कहा कि एन.एफ.एस. के कारण आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों के साथ लगातार अन्याय हो रहा है। उन्होंने काले समिति की सिफारिशों, सभी पात्र उम्मीदवारों के लिए साक्षात्कार कॉल और विश्वविद्यालय भर में यूजीसी विनियम 2018 स्क्रीनिंग मानदंडों के एक समान आवेदन के पूर्ण कार्यान्वयन की मांग को दोहराया।धरने में शामिल हुए अकादमिक परिषद (एसी) और कार्यकारी परिषद (ई.सी.) के निर्वाचित सदस्यों ने कॉलेज खेल समितियों पर डी.यू.एस.सी.के बाहरी प्रतिनिधित्व को अनिवार्य करने वाले विश्वविद्यालय के परिपत्र पर आपत्ति जताई। उन्होंने आकस्मिक रिक्तियों के दौरान तदर्थ और अतिथि नियुक्तियों पर प्रतिबंधों की भी आलोचना की। ये केवल शिक्षण-सीखने की प्रक्रिया को बाधित करते हैं जबकि स्थायी पद खाली रहते हैं। लाइब्रेरियन, शारीरिक शिक्षा शिक्षकों के बारे में और चिंताएं व्यक्त की गईं, जिनकी सेवा शर्तें और पदोन्नति के रास्ते वर्षों से अनसुलझे हैं।डूटा के अध्यक्ष प्रोफेसर वी.एस. नेगी और डूटा के अन्य पदाधिकारियों ने कुलपति को एक ज्ञापन सौंपा और चेतावनी दी कि अगर विश्वविद्यालय इन महत्वपूर्ण मुद्दों को नजरअंदाज करना जारी रखता है तो संघर्ष तेज हो जाएगा।



