फिरोजाबाद। लखनऊ में हुए भीषण अग्निकांड के बाद स्वास्थ्य संस्थानों में अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं की जांच तेज कर दी गई है। इसी क्रम में फिरोजाबाद के ट्रॉमा सेंटर और 100 शैय्या अस्पताल में आयोजित मॉक ड्रिल के दौरान कई गंभीर खामियां सामने आई हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि दोनों अस्पतालों में आपातकालीन स्थिति में मरीजों, तीमारदारों और कर्मचारियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए कोई वैकल्पिक निकासी मार्ग उपलब्ध नहीं है।
बुधवार दोपहर ट्रॉमा सेंटर में अग्नि सुरक्षा को लेकर मॉक ड्रिल आयोजित की गई। सायरन बजते ही अस्पताल में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों के बीच अफरा-तफरी का माहौल बन गया। कई लोग सायरन बजने का कारण जानने के लिए इधर-उधर दौड़ते नजर आए। बाद में अस्पताल प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यह केवल अग्नि सुरक्षा तैयारियों की जांच के लिए आयोजित मॉक ड्रिल थी।
मॉक ड्रिल के दौरान अस्पताल की निकासी व्यवस्था की बड़ी कमजोरी सामने आई। ट्रॉमा सेंटर में आने-जाने के लिए केवल एक मुख्य गेट है। किसी भी आपात स्थिति, विशेषकर आग लगने की घटना में यही गेट सैकड़ों लोगों के बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता होगा। ऐसे में भगदड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
अस्पताल परिसर चारों तरफ से ऊंची दीवारों से घिरा हुआ है। यदि मुख्य गेट पर भीड़ बढ़ती है तो लोगों को जान बचाने के लिए दीवार फांदने तक की नौबत आ सकती है, जिससे हादसे का खतरा और बढ़ जाएगा।
100 शैय्या अस्पताल की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है। यहां भी प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही गेट है। इतनी बड़ी स्वास्थ्य इकाई में आपातकालीन निकासी के वैकल्पिक मार्ग का अभाव सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
गौरतलब है कि लखनऊ अग्निकांड के बाद प्रशासन ने जिले के ट्रॉमा सेंटर, जिला अस्पताल और विभिन्न कोचिंग संस्थानों में अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया था। हालांकि निरीक्षण के दौरान इन महत्वपूर्ण कमियों पर ध्यान नहीं दिया गया। अब मॉक ड्रिल में सामने आई खामियों ने अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था और आपदा प्रबंधन तैयारियों की पोल खोल दी है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपये की लागत से अस्पताल भवन तो तैयार कर दिए गए, लेकिन अग्नि सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के बुनियादी मानकों की अनदेखी की गई है। ऐसे में किसी बड़े हादसे की स्थिति में मरीजों और उनके परिजनों की सुरक्षा गंभीर चुनौती बन सकती है।
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