देश में इन दिनों यूजीसी विवादों के बीच सामाजिक तनाव की लकीरें और गहरी होती दिख रही हैं। इसी क्रम में बिहार के दरभंगा ज़िले के हरिनगर गांव से सामने आया मामला न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर सवाल खड़े करता है। गांव के 200 से अधिक ब्राह्मणों पर एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर, बिना व्यापक जांच के की गई गिरफ्तारियां और एकतरफा प्रशासनिक कार्रवाई ने समाज, राजनीति और न्याय व्यवस्था—तीनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिस कानून को ऐतिहासिक रूप से शोषित वर्गों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, उसी कानून के दुरुपयोग के आरोप अब बार-बार सामने आ रहे हैं। हरिनगर प्रकरण में यह आरोप भी है कि जिन लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई, उनमें से कुछ उस समय गांव में मौजूद तक नहीं थे। क्या यह न्याय की मूल भावना—“एक भी निर्दोष को सज़ा न हो”—के खिलाफ नहीं है?
ग्रामीण समाज की अपनी एक संरचना होती है। वहां लोग आपसी लेन-देन करते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े होते हैं और कई बार विवादों को आपस में सुलझाने की कोशिश भी करते हैं। हर हस्तक्षेप को ‘सामूहिक अपराध’ मान लेना और पूरे समाज को कठघरे में खड़ा कर देना, सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने जैसा है। यह स्थिति भविष्य के लिए भी एक डर पैदा करती है—अब कौन किसी बीमार को अस्पताल ले जाएगा, कौन झगड़ा शांत कराने आगे आएगा?
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह मामला सवर्ण समाज और भारतीय जनता पार्टी के रिश्तों में आई दरार को भी उजागर करता है। वर्षों तक भाजपा के कोर वोटर माने जाने वाले सवर्ण वर्ग में यह भावना गहराती जा रही है कि पार्टी अब उनकी बात सुनने को तैयार नहीं। आश्वासन की राजनीति से आगे बढ़कर ठोस कदमों की मांग की जा रही है—जांच के बाद गिरफ्तारी, गलत शिकायत पर कार्रवाई और कानून के दुरुपयोग को रोकने के स्पष्ट प्रावधान।
यह प्रश्न भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि जब राजनीतिक मंचों से आपत्तिजनक नारों और गालियों पर लंबा विमर्श हो सकता है, तो फिर ब्राह्मणों या सवर्णों के खिलाफ खुलेआम नफरत भरे नारों पर चुप्पी क्यों? क्या किसी की मां, बहन या बेटी की इज्जत किसी और से कम है? लोकतंत्र में संवेदनशीलता चयनात्मक नहीं हो सकती।
बिहार में एससी/एसटी आयोग की सक्रियता और एक पक्ष को त्वरित राहत—इलाज, कानूनी सहायता और मुआवजा—देना प्रशासनिक तत्परता दर्शाता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या न्याय का तराज़ू दोनों पलड़ों में बराबर रखा जा रहा है? यहां तक कि दलित समाज के भीतर से भी यह आवाज़ उठ रही है कि कानून संरक्षण के लिए है, न कि पेशा बन जाने के लिए।
राजनीतिक समीकरणों में भी बदलाव के संकेत हैं। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती का सधे हुए शब्दों में इस मुद्दे पर बोलना सवर्णों के बीच एक नई चर्चा को जन्म दे रहा है। पर असली सवाल यही है—क्या कोई भी राजनीतिक दल ऐसा साहस दिखाएगा कि वह एससी/एसटी एक्ट में दुरुपयोग रोकने के ठोस प्रावधानों की बात करे?
कोई भी समाज अपराधियों को संरक्षण नहीं देना चाहता, लेकिन ऐसा कानून भी नहीं होना चाहिए जो पूरे समाज को अपराधी बना दे। हरिनगर की घटना एक चेतावनी है—अगर न्याय, कानून और राजनीति के बीच संतुलन नहीं साधा गया, तो सामाजिक विश्वास टूटेगा, और उसका खामियाज़ा पूरे लोकतंत्र को भुगतना पड़ेगा।
दैनिक समाज जागरण का मानना है कि अब वक्त भावनात्मक राजनीति से आगे बढ़कर निष्पक्ष जांच, संवेदनशील प्रशासन और संतुलित कानून व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाने का है—क्योंकि न्याय अगर डर पैदा करने लगे, तो समाज चुप हो जाता है, और चुप समाज सबसे खतरनाक होता है।



