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जय हिंदी बोलते हैं, जी अंग्रेजी करते हैं, हिंदी को हमने मंच दिया, मगर मौका नहीं

कृति आरके जैन

हिंदी से हमारा रिश्ता भी बड़ा अजीब है—साल में एक दिन प्रेम उमड़ता है और बाकी दिन सुविधा जीत जाती है। 14 सितंबर को वही हिंदी सम्मान पाती है, जिसे 364 दिन सुविधा, करियर और प्रतिष्ठा के लिए पीछे कर दिया जाता है। दफ्तरों में अधिकारी हिंदी की महिमा गाते हैं, अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के अभिभावक बच्चों से हिंदी कविता सुनवाते हैं और स्टूडियो में एंकर उसकी अस्मिता पर बहस करते हैं। माइक बंद होते ही सब अपनी सुविधाजनक भाषा में लौट जाते हैं। इसलिए हिंदी दिवस अब भाषा का उत्सव नहीं, हमारी भाषाई दोहरी मानसिकता का सालाना पर्दाफाश है। पहले यह दिखावा सीमित था; अब मीडिया, तकनीक और सोशल मीडिया ने इसे खुली सच्चाई बना दिया है।

सरकारी दफ्तरों में हिंदी की हैसियत साल में एक दिन सजने वाली उस कुर्सी जैसी है, जिस पर बैठने का अधिकार किसी को नहीं होता। साल भर फाइलें, आदेश और निर्णय अंग्रेजी में चलते हैं। हिंदी दिवस आते ही शब्दकोश खुलते हैं, भाषण लिखे जाते हैं और अधिकारी ऐसी हिंदी बोलते हैं कि हिंदी भी अपना परिचय पूछ बैठे। समारोह खत्म होते ही वह फिर फाइलों के किनारे चली जाती है। नौकरशाही ने हिंदी को कामकाज की भाषा से उठाकर समारोह की सजावट बना दिया है। भव्य आयोजन से यह भ्रम तो बन जाता है कि हिंदी का काम हो रहा है, पर असली सवाल मंच का नहीं, प्रशासन में हिंदी के वास्तविक इस्तेमाल का है।

घर में हिंदी की आरती और स्कूल में अंग्रेजी की फीस—हमारे भाषाई चरित्र का इससे बेहतर परिचय नहीं। हिंदी दिवस पर माता-पिता बच्चों को हिंदी की किताबें देते, भाषण तैयार कराते और मातृभाषा पर गर्व जताते हैं; लेकिन भविष्य के लिए अंग्रेजी माध्यम स्कूल चुनते हैं। डर रहता है कि हिंदी माध्यम का बच्चा अवसरों में पिछड़ जाएगा। यह डर भाषा का नहीं, व्यवस्था का है। अंग्रेजी रोजगार, प्रतिष्ठा, तकनीक और सामाजिक सुरक्षा का पासपोर्ट है, जबकि हिंदी संस्कृति और भावनाओं तक सीमित है। हमने बच्चों से कहा—हिंदी से प्रेम करो, भविष्य अंग्रेजी में बनाओ। फिर शिकायत करते हैं कि नई पीढ़ी हिंदी से दूर क्यों है।

राजनीति में हिंदी का प्रेम वोट के साथ आता है और सत्ता के साथ बदल जाता है। चुनावी मंच पर नेता जनता की भाषा बोलता है; सत्ता में पहुँचते ही भाषा बदल जाती है। संसद में हिंदी की प्रतिष्ठा का सवाल उठता है, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अंग्रेजी सुविधा बनती है और नीतियों के दस्तावेजों में वही भाषा हावी रहती है, जिसे आम नागरिक अक्सर अनुवाद से समझता है। हिंदी दिवस पर हिंदी बढ़ाने के संकल्प दोहराए जाते हैं, जबकि भाषा संकल्प से नहीं, निरंतर व्यवहार से मजबूत होती है। जरूरत में हिंदी, सुविधा में अंग्रेजी—यह प्रेम नहीं, चयनात्मक उपयोग है। सत्ता जब हिंदी को सिर्फ जनता तक पहुँचने का औजार बनाएगी, तब वह मजबूत भाषा नहीं, राजनीतिक सुविधा भर रहेगी।

बाजार को हिंदी की शुद्धता नहीं, उसकी पहुँच चाहिए। इसलिए विज्ञापन हिंदी में हैं, नारे हिंदी में गूंजते हैं और कंपनियाँ उपभोक्ता से हिंदी में जुड़ती हैं; लेकिन बड़े फैसले, तकनीकी दस्तावेज और प्रबंधन अब भी अंग्रेजी में चलते हैं। मीडिया ने भी हिंदी को बाजार के रंग में ढाल दिया है—शब्द हिंदी के हैं, पर तेवर अंग्रेजी, बाजार और सनसनी के। हिंदी दिवस पर हम शुद्धता का हिसाब लगाते हैं, जबकि रोजमर्रा की हिंदी स्वाभाविक रूप से बदल रही है। सवाल यह नहीं कि उसमें अंग्रेजी के कितने शब्द आए; सवाल है कि विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था और नए ज्ञान की कितनी सामग्री हिंदी में आई। भाषा की ताकत शुद्ध शब्दों में नहीं, नए विचारों को व्यक्त करने की क्षमता में है।

हिंदी को मंच पर नहीं, सड़क पर जाकर देखिए—उसका असली चेहरा वहीं मिलेगा। घर, बाजार, मोबाइल और मंच की हिंदी अलग-अलग है। आम आदमी जिस भाषा में प्रेम, झगड़ा, दुख और व्यवस्था पर गुस्सा करता है, मंच पर वही भाषा इतनी शुद्ध कर दी जाती है कि आदमी ही गायब हो जाता है। ऐसी शुद्धता, जिसे न घर पहचानता है, न सड़क। जबकि भाषा संग्रहालय की वस्तु नहीं; वह जीवित है, बदलती है, दूसरी भाषाओं से मिलती है और नए शब्द अपनाती है। हिंदी का संकट उसका बदलना नहीं, उसके अवसरों का घटना है। बदलती हिंदी को रोकना नहीं, बदलते जीवन की ताकत बनाना होगा।

दुनिया से हिंदी का सम्मान मांगने से पहले घर में उसका सम्मान जरूरी है। विदेशों में हिंदी की व्यापकता, बोलने वालों की संख्या और संभावनाओं के दावे होते हैं; सम्मेलन होते हैं, गौरवगान होता है और हिंदी अपनाने की अपील की जाती है। लेकिन देश में उच्च शिक्षा, शोध, तकनीक, प्रशासन और रोजगार के कितने अवसर हिंदी में हैं? यही असली कसौटी है। हिंदी में ज्ञान और तकनीकी क्षमता बढ़े, तभी वह वैश्विक शक्ति बनेगी। भाषा की ताकत बोलने वालों की संख्या में नहीं, ज्ञान, विचार, रोजगार और संस्थागत शक्ति में है। घर में हिंदी को दोयम रखकर दुनिया से सम्मान मांगना वैसा ही है जैसे घर के मेहमान को भूखा रखकर बाहर उसके स्वागत का ढिंढोरा पीटना।

हिंदी दिवस की सार्थकता 14 सितंबर में नहीं, बाकी 364 दिनों में तय होगी। हिंदी को भाषण, सम्मान और समारोह नहीं, अवसर चाहिए—शिक्षा, प्रशासन, ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, रोजगार और बाजार में उसका प्रभावी इस्तेमाल। अंग्रेजी से संघर्ष नहीं, हिंदी को अवसरों से जोड़ना समाधान है। विडंबना यही है कि हम हिंदी को संस्कृति और अंग्रेजी को करियर मानते हैं। यह दोहरापन तब टूटेगा, जब हिंदी में काम करना सम्मान के साथ व्यावहारिक विकल्प भी बनेगा। जिस दिन हिंदी को अपने अस्तित्व का प्रमाण देने के लिए 14 सितंबर की जरूरत नहीं रहेगी, उसी दिन हिंदी दिवस समारोह नहीं, बदलते दौर में हिंदी की वास्तविक शक्ति का प्रतीक बनेगा।

कृति आरके जैन

शिक्षाविद्

बड़वानी (मप्र)

ईमेल: kratijainemail@gmail.com


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