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राज्यव्यापी हड़ताल का असर: कोचाधामन में जनजीवन ठप, छात्र-छात्राओं का भविष्य संकट में

वीरेंद्र चौहान, समाज जागरण ब्यूरो किशनगंज।
बिहार में 11 फरवरी से जारी राजस्व कर्मियों की राज्यव्यापी हड़ताल का व्यापक असर अब जिलों और प्रखंडों में साफ दिखाई दे रहा है। किशनगंज जिले के कोचाधामन प्रखंड में राजस्व विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के हड़ताल पर रहने से आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो गया है। जमीन से संबंधित सभी कार्य पूरी तरह ठप पड़े हैं, जिससे लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।


ग्राम पंचायत डेरामारी के मुखिया मो. शाहबाज आलम ने बताया कि लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए प्रतिदिन अंचल कार्यालय का चक्कर काट रहे हैं, लेकिन न तो उनकी सुनवाई हो रही है और न ही किसी प्रकार का कार्य निष्पादित किया जा रहा है। पहले से लंबित मामलों का निपटारा नहीं हो पा रहा है, वहीं नए आवेदन भी लगातार लंबित होते जा रहे हैं।
वैकल्पिक व्यवस्था के तहत तैनात प्रभारी अंचल अधिकारी की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय रैयतों का आरोप है कि अधिकारी आम जनता की समस्याओं के समाधान के प्रति उदासीन हैं और केवल औपचारिकता निभाई जा रही है, जिससे लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।


स्थिति उस समय और अधिक गंभीर हो गई जब पंचायत सचिव भी हड़ताल पर चले गए। इसके चलते जाति, आवासीय एवं आय प्रमाण पत्र सहित जन्म एवं मृत्यु प्रमाण पत्र जैसे आवश्यक दस्तावेजों का निर्गमन पूरी तरह बाधित हो गया है।
इधर, स्कूलों और कॉलेजों में नामांकन की प्रक्रिया जारी है। ऐसे में आवश्यक प्रमाण पत्र समय पर उपलब्ध नहीं होने के कारण छात्र-छात्राओं के सामने नामांकन का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। यदि शीघ्र समाधान नहीं किया गया तो बड़ी संख्या में विद्यार्थियों का शैक्षणिक भविष्य प्रभावित हो सकता है।


स्थानीय लोगों ने प्रशासन से अविलंब हस्तक्षेप कर हड़ताल समाप्त कराने तथा कार्य व्यवस्था को सुचारु रूप से बहाल करने की मांग की है।
वहीं, कोचाधामन प्रखंड के प्रभारी अंचल अधिकारी पुरेंद्र कुमार ने बताया कि उनके पदभार ग्रहण करने के समय लगभग ढाई हजार आवेदन लंबित थे, जिन्हें अब शून्य कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि सभी आवेदनों की ऑनलाइन समीक्षा की जा रही है और शेष कार्यों के निष्पादन की प्रक्रिया जारी है।


हालांकि, प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच स्पष्ट अंतर देखने को मिल रहा है, जो स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।


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