अश्विनी वालिया कुरुक्षेत्र
इस युग में (1398-1518) में प्रकट होना एक बहुत बड़ी घटना है। इस युग में प्रकट हुए कबीर साहेब एकमात्र ऐसे कवि एवं समाज सुधारक, विचारक, पाखंड के आलोचक, मानव अधिकारों के प्रबल समर्थक महान संत हैं, जिनकी वाणी आज तक सर्वथा सार्थक है। उक्त विचार सतगुरु कबीर प्रदर्शनी के प्रभारी श्री जय नारायण खटक (कुराड़) प्रधान श्री कबीर धाणक समाज धर्मशाला एवं छात्रावास सभा कुरुक्षेत्र ने अंतर्राष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव बह्रमसरोवर पर बूथ नंबर 565 पर व्यक्त किये। प्रधान जी ने कबीर साहेब जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उनके जीवन के बारे में बताया कि कबीर साहेब जी ने कैसे किताबी शिक्षा के रहस्यों को पढ़ा भी नहीं फिर भी उसने परमात्मा के रहस्य को कैसे जाना? यह भी सच है की कबीर जैसा अध्ययन या अध्यापन का परिणाम नहीं होते वरना इस युग विशेष में ऐसा महानायक युगपुरुष, महामानव जिसने अपने समकालीन युग में न केवल जनता की इच्छाओं का केवल आदर किया बल्कि उस समय व्याप्त पाखंड पर अपने शब्दों से, अपने दोहो से करारा प्रहार भी किया। उन्होंने कबीर जी के दोहों की चर्चा करते हुए हुए कहा कि उनकी ये रचनाएं समाज में व्यापक बुराईयों को दूर करने में सहायक सिद्ध हुई। माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर॥, पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात। एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात॥, दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार, तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार। जैसे दोहे आज भी लोगों को उनकी रचनाओं की याद दिलाते हैं। उन्होंने कहा कि संत कबीर भक्तिकाल के एक मात्र ऐसे कवि थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज सुधार के कार्यों में लगा दिया। समाज को उनके दिखाए गए आर्दशों पर चलकर अपना जीवन सफल बनाना चाहिए।



