मानव जीवन में “माँ” का स्थान सबसे ऊँचा माना गया है। संसार के लगभग सभी धर्मों और धार्मिक ग्रंथों में माँ को भगवान के समान सम्मान दिया गया है। माँ केवल जन्म देने वाली ही नहीं होती, बल्कि वह प्रेम, त्याग, करुणा और संरक्षण की जीवित प्रतिमा होती है। इसलिए भारतीय संस्कृति में कहा गया है— “मातृ देवो भव”, अर्थात माँ को देवता के समान मानो।
हिंदू धार्मिक ग्रंथों में माँ का स्थान अत्यंत महान बताया गया है। ऋग्वेद और अथर्ववेद में माता को जीवन की प्रथम गुरु कहा गया है। मनुस्मृति में कहा गया है कि माता-पिता और गुरु का सम्मान करना मनुष्य का सर्वोच्च कर्तव्य है। वहीं रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी माता के त्याग और स्नेह को सर्वोच्च बताया गया है। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के जीवन में भी उनकी माताओं का महत्वपूर्ण योगदान बताया गया है।
केवल हिंदू धर्म ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मों में भी माँ को अत्यधिक सम्मान दिया गया है। क़ुरआन में कहा गया है कि माँ ने अपने बच्चे को कष्ट सहकर जन्म दिया और उसका पालन-पोषण किया, इसलिए उसका सम्मान करना हर संतान का कर्तव्य है। इसी प्रकार बाइबल में भी माता-पिता के सम्मान को ईश्वर की आज्ञा माना गया है।
धार्मिक दृष्टि से माँ केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि सृजन की शक्ति है। वह परिवार की आधारशिला होती है। बच्चे के संस्कार, चरित्र और भविष्य का निर्माण सबसे पहले माँ के हाथों में होता है। माँ की गोद बच्चे की पहली पाठशाला होती है, जहाँ वह प्रेम, भाषा, संस्कार और जीवन के मूल्यों को सीखता है।
अंततः कहा जा सकता है कि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार माँ का स्थान इस संसार में सबसे ऊँचा है। माँ के बिना जीवन की कल्पना भी अधूरी है। वह प्रेम की वह धारा है जो बिना किसी स्वार्थ के निरंतर बहती रहती है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपनी माँ का सम्मान करे, उनकी सेवा करे और उनके त्याग को सदैव याद रखे। यही सच्चे धर्म और मानवता का मार्ग है।
अदिती कुशवाहा
बैकुंठपुर ( कोरिया) छत्तीसगढ़
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