समाज जागरण अनिल कुमार
हरहुआ वाराणसी। चोलापुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत गोसाई मोहाव- बाबतपुर मार्ग पर स्थित आदि शक्ति मां दुर्गा भैठौली धाम न केवल एक धार्मिक स्थल है बल्कि आस्था का जीवंत प्रतीक बन चुका है। कहते हैं जब विश्व युद्ध की आग धधक रही थी इस दौरान इस गांव में देवी दुर्गा ने स्वयं प्रकट होकर इस स्थान को अपना निवास बनाया जहां लोग अपनी मुरादें लेकर धन्य होते हैं।
एक बालक के एक दर्शन और एक चमत्कार
यह कथा लगभग सौ वर्षों से अधिक पूर्व की गांव भैठौली के एक किसान कन्हैया सिंह अपने पुत्र के स्वास्थ्य को लेकर बेहद चिंतित थे उनके दो बड़े पुत्र बीमारी के चलते हैं अकाल मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे तीसरे पुत्र राजनाथ सिंह भी गंभीर रूप से बीमार पड़े थे। इसी बीच एक दिन दोपहर के समय जब 12 वर्षीय राजनाथ सिंह कहीं जा रहे थे तभी सफेद वस्त्रों में एक वृद्धा ने उन्हें रोका। बालक डरकर घर भाग आया और उसी दिन से वह तेज बुखार में तपने लगा। यह कोई सामान वृद्धा नहीं बल्कि स्वयं मां आदि शक्ति दुर्गा थी। गांव के पूरब में स्थिति नीम के वृक्ष के नीचे मां ने जमीन पर ठोकर मारी जिससे एक दिव्य मूर्ति प्रकट हुई।इस स्थान को मां ने अपना स्थायी बनाया और कहा कि “मेरा प्रथम पूजन केवल इस बालक के हाथों से होगा”।
राजनाथ बने पहले पुजारी
माँ देवी की इच्छा कि पूजा और आरती सेवा राजनाथ सिंह ही करें और वे ही जीवन भर मां की सेवा की। श्रद्धालुओं को भस्म,विभूति देकर दुख, दरिद्रता दूर कर भक्ति प्रदान की।
सैकड़ो वर्षों से चल रही पूजा परंपरा
मंदिर के वर्तमान पुजारी रामधनी मिश्रा (80 वर्ष) बताते हैं कि राजनाथ सिंह के बाद उनके वंशजों ने मंदिर की पूजा व्यवस्था उनके दादा को सौंप दी। तब से यह परंपरा उनके परिवार से ही चली आ रही है करीब 40 वर्षों से मैं मां की सेवा कर रहा हूं। हर नवरात्र में यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है जो मेला जैसा दृश्य होता है।
पूजा सामग्री की दुकान जो इतिहास से जुड़ी है
मंदिर परिसर में स्थित एक पूजा सामग्री दुकान भी इस मंदिर की परंपरा का हिस्सा बन चुकी है दुकान के वर्तमान संचालक सत्येंद्र कुमार सिंह उम्र 36 वर्ष जो कन्हैया सिंह के सबसे छोटे पुत्र पारसनाथ सिंह के छठवीं पीढ़ी हैं बताते हैं कि यह दुकान हमारे दादा लाल बहादुर सिंह ने लगभग 80 वर्ष पहले शुरू की थी तब से यह दुकान न केवल जीविका का साधन है बल्कि श्रद्धा का प्रतीक बन चुका है।
भक्ति, विवाह और संस्कार का केंद्र
मंदिर प्रांगण में विवाह, बच्चों का मुंडन संस्कार ,कथा ,पाठ, करहिया चढ़ाने (हलवा–पूरी चुनरी) जैसे धार्मिक आयोजनों का प्रमुख केंद्र बन चुका है। चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां लाखों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं। अष्टमी के दिन विशेष ध्वज फेरी कलश यात्रा और श्रृंगार किया जाता है। यहां पर मां को साक्षी मानकर हर कार्य संपन्न किया जाता है।विशेष पूजा अर्चना और भंडारा भी होता हैं।
जो प्राणी सच्चे मन से मां को पुकारता है मां उसकी झोली खाली नहीं लौटाती। कल्याणदायिनी मां दुर्गा भैठौली धाम आज सिर्फ मंदिर नहीं,बल्कि आस्था-विश्वास का तीर्थ बन चुका है। यहां की मिट्टी,आबोहवा भक्तिमय सब कुछ मां आदिशक्ति की कृपा का अनुभव करा रही है। जहां सभी भक्तजनों ,श्रद्धालुओं का कल्याण हो रहा है।



