जिलाधिकारी को अपनी व्यथा का ज्ञापन सौप कर, लगाया न्याय का गुहार
दैनिक समाज जागरण
सोनभद्र। जिले में स्वास्थ्य महकमा के जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी का पुरी तरह से निर्वहन नहीं कर पा रहे। शिकायत करने के बाद भी सम्बंधित अपने कर्तव्यों से आखिर क्यों पीछे भाग रहे है, ये सवाल आदिवासी जिले के लिए एक बहुत बड़ी समस्या है। ओबरा थाना क्षेत्र के एक पीड़ित ने डीएम को ज्ञापन सौपकर अपनी व्यथा सुनाई थी लेकिन कई दिन बीत जाने के बावजूद कोई भी सार्थक पहल पीड़ित की व्यथा को लेकर नहीं की गईं। दरअसल बिल्ली मारकुण्डी टोला-खैरटिया गांव के रहने वाले इन्द्रजीत पुत्र स्व० राम श्रृंगार ने लाईफ केयर हॉस्पिटल रॉबर्ट्सगंज, सोनभद्र में दाहिने हाथ की हड्डी में फ्रैक्चर होने के कारण इलाज़ कराया था।
डॉ० प्रमोद प्रजापति दाहिने हाथ की हड्डी का आपरेशन किया और दिनांक-27.12.2024 को डिस्चार्ज कर दिये। पीड़ित ने बताया डिस्चार्ज होने के बाद वो अपना सामान और दवा लेकर घर आ गया, लगभग 2 महीने बाद मुझे पता चला कि मेरा दाहिना हाथ का गलत नस कटने के कारण सूखने लगा है और फिर जब समस्या लेकर पीड़ित डॉ० प्रमोद प्रजापति जी से मिलकर इस बात को बताया एवम् अपना हाथ दिखाया तो उनका जवाब मिला की मैंने आपरेशन कर दिया। अगर नस कट गई है तो मैं क्या करूं ? जबकि पीड़ित इंद्रजीत ने अपनी व्यथा सुनाते हुए डॉ से बताया कि घर में उनके सिवा कमाने वाला कोई और नहीं है। सही तरीके से ईलाज कर दीजिए ताकि मैं ठीक होकर अपना और अपने परिवार का देखभाल कर सकूं तो पीड़ित के अनुसार समस्या का हल करने की बजाय उसे हास्पीटल से भगा दिया। भड़के डॉक्टर ने दो टूक कहां मैं कुछ भी नहीं करूंगा तुमकों जो करना है कर लो पुलिस और कानून तो मेरे जेब में है हम सब देख लेंगे।
जबकि लाइफ केयर अस्पताल इतना बड़ा होने के बावजूद सिर्फ एक डॉक्टर के भरोसे चल रहा। सैकड़ों की संख्या में रोजाना मरीज को जल्दी में देखा जाता है और मरीज कही दूसरी जगह इलाज़ न करा ले और पैसा कोई दूसरा कमा ले इस बात को सोचकर तुरंत डरा कर ऑप्रेशन कर दिया जाता है। डॉ के डराने पर मरीज भी बेचारा मरता क्या न करता वाली बात पर आ जाता है वो इलाज़ करा लेता है। जिला सयुंक्त अस्पताल से चंद कदमों की दुरी पर संचालित अस्पताल आखिर किसके मेहराबानी से चल रहा है। जबकि नियम कुछ और कहते है। अस्पताल से आने वाले राजस्व का लेखा जोखा में भी बढ़ा हेरफर होने की बात सामने आई। अस्पताल में मौजूद मेडिकल पर मिलने वाली भी दवाये महंगी होती है जबकि वही काम करने वाली दूसरी कंपनी की दवा बाहरी मेडिकल पर सस्ती मिलती है। मरीज महंगी फीस दे और महंगी दवाई ले फिर भी उसका सही से इलाज ना हो पाए तो गरीब मरीज कर्ज में ही डूबा रहेगा और मानसिक टेंशन अलग से। परिवार का जीविकोपार्जन की चिंता लिए कभी-कभी मरीज आत्महत्या का आत्मघाती कदम भी उठा लेता है। सरकार का फरमान है कि मरीजों को प्राइवेट अस्पताल सहूलियत दे। अगर मरीज कोई भी शिकायत करता है तो उसे शिकायत को गंभीरता से जिला स्वास्थ्य विभाग ले और जांच की जाए। अगर दोषी अस्पताल संचालक पाया जाता है तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए। इंद्रजीत का मामला जिलाधिकारी के संज्ञान में भी है और स्वास्थ्य विभाग के भी। लेकिन डीएम के आदेशों की अहवेलना आखिर स्वास्थ्य विभाग क्यों कर रहा है ये बड़ा सवाल है।

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