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बिना नाम के चल रहा विद्यालय, शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल।

योगेश कुमार गुप्ता/ समाज जागरण

ओबरा/ सोनभद्र। ओबरा में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। कभी ओबरा इंटर कॉलेज के नाम से संचालित यह विद्यालय गरीब आदिवासी व बनवासी बच्चों की शिक्षा का एकमात्र सहारा था, लेकिन अब यह विद्यालय बिना किसी नाम के संचालित हो रहा है। बताया जा रहा है कि विद्यालय को प्राइवेट संस्था डीएवी को सौंपे जाने के बाद इसका पुराना नाम पूरी तरह हटा दिया गया, जबकि आज तक विद्यालय के बोर्ड पर कोई नया नाम अंकित नहीं किया गया है।


स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस पूरे मामले में सोनभद्र के जिम्मेदार शिक्षा अधिकारी भी मौन सहमति दिए हुए हैं। नियमों के विपरीत बिना नाम के विद्यालय का संचालन न सिर्फ अवैध है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था के साथ खुला मजाक भी है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर गरीब आदिवासी और बनवासी समुदाय पर पड़ा है। ओबरा और आसपास के कई दर्जन गांवों के बच्चे, जो पहले इसी विद्यालय में पढ़ाई करते थे, अब महंगी निजी शिक्षा वहन न कर पाने के कारण शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि डीएवी जैसी निजी संस्था की फीस उनके लिए असंभव है।


आरोप यह भी है कि इस पूरी प्रक्रिया में ओबरा परियोजना की भूमिका संदिग्ध है, जिसने गरीब आदिवासी बच्चों को शिक्षा से “बेघर” करने वाली व्यवस्था को बढ़ावा दिया। सवाल यह उठता है कि क्या विकास परियोजनाओं की आड़ में आदिवासी बच्चों का भविष्य अंधेरे में धकेला जा रहा है?
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि विद्यालय का स्पष्ट नाम और दर्जा तत्काल तय किया जाए, गरीब आदिवासी बच्चों के लिए निःशुल्क या सस्ती शिक्षा की व्यवस्था बहाल की जाए, और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो।


अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर कब तक आंखें मूंदे रहता है, या फिर आदिवासी बच्चों के शिक्षा अधिकार की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।


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