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ईश्वर स्तुति विषय पर गोष्ठी सम्पन्न

ईश्वर के गुणों को जीवन में धारण करने से कल्याण सम्भव-रजनी गर्ग

ब्रह्मांड पर विश्वास ही ईश्वर नामक उस परम शक्ति के अस्तित्व का सबसे बड़ा साक्ष्य है-सुधीर बंसल

गाजियाबाद,बुधवार 8 अप्रैल 2026,केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में ईश्वर स्तुति विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया।य़ह कोरोना काल से 776 वाँ वेबिनार था।

आर्य नेत्री रजनी गर्ग ने कहा कि जब हम ईश्वर की स्तुति करते हैं तो ईश्वर के गुणों का समावेश होता है,उन्हें अपने जीवन में धारण करना चाहिए तभी मानव कल्याण सम्भव होगा।

वैदिक प्रवक्ता सुधीर कुमार बंसल ने विषय पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ईश्वर-स्तुति है तो दो शब्दों का समन्वय पर वैदिक विधा की जान है।प्रत्येक आर्य-जन ऋषि दयानन्द चयनित यजुर्वेद के 8 मन्त्र जिन्हें ईश्वर स्तुति प्रार्थनोपसना के शीर्षक से जाना जाता है,यज्ञ प्रारम्भ करने से पूर्व अर्थ और पद्य सहित एकाग्रता से उच्चारित करते हैं। इनमें पहला ही मन्त्र अपने आप में श्रेष्ठतम महत्वपूर्ण है,इसमें प्रार्थना की गई है कि हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्त्ता प्रभु! हमारे सम्पूर्ण दुर्गुणों,दुर्व्यसनों और दुःख-कष्टों को दूर कीजिए और सद्गुणों के साथ हमारा कल्याणकारी मार्ग प्रशस्त करिये।इसी क्रम में अथर्ववेद के एक मन्त्र यो भूतं च भव्यं च सर्वंयश्चाधितिष्ठति को उद्धरित करते हुए ईश्वर को भूत,भविष्य और वर्तमान के स्वामी से आख्यातित किया है जिसका सुख ही केवल-मात्र स्वरूप है।ईश्वर में दुःख लेशमात्र व अंशमात्र भी नहीं।

परमात्मा में सर्वकर्मों के फल अर्पित करके निष्काम भाव से कर्म करना ही सही ईश्वर-प्रणिधान है इससे चित्त के संस्कार-समूह का नाश हो जाता है।असंख्य जीवों के असंख्य कर्म-संस्कार चित्त में जमा रहते हैं और इसी कारण विभिन्न शरीरों में आबद्ध होकर सुख और दुःखों के भोगों को मनुष्य भोगता है।जिस शक्ति से हम लोग शुभ कार्य करते हैं,उसी शक्ति से अशुभ कार्य भी जाने-अनजाने करते हैं।इन अशुभ कार्यों के संस्कार विनष्ट करने के लिए ही क्रिया-योग,ईश्वर-स्तुति और उपासना का आचरण जीवन में प्रतिदिन अपनाना चाहिए जो जीवन को शुद्ध-परिशुद्ध करे! ईशस्तुति द्वारा सांसारिक बंधन से चित्त मुक्त होकर मनुष्य परमात्मा की ओर धावित होता है।आर्य- समाज के दस नियमों में से दूसरा नियम ईश्वर स्तुति के लिए श्रेष्ठतम माध्यम ऋषि ने 150 वर्ष हुए, आर्य-समाज की स्थापना के साथ रचित किया था।ईश्वर को सच्चिदानन्द स्वरूप व्याख्यातित करने के अलावा और अन्य 19 विशेषणों से उसका गुणगान किया गया है।जिस ईश्वर की हम उपासना करते हैं वह निराकार,सर्वशक्तिमान, अज़र-अमर और सृष्टिकर्त्ता आदि गुणों से आप्लावित है,इसलिए भी उसकी नित्य,प्रतिदिन भोर-बेला में स्तुति अभीष्ट है।इस सृष्टि की अति बुद्धिमत्ता पूर्वक रचना ही इसके रचयिता को सिद्ध करती है।इस ब्रह्मांड पर विश्वास ही ईश्वर नामक उस परम शक्ति के अस्तित्व का सबसे बड़ा साक्ष्य है।

कार्यक्रम की अध्यक्ष राजश्री यादव ने भी ईश्वर स्तुति प्रार्थनोपासना के 8 मन्त्रों का स्वरचित श्रेष्ठ कवित्त प्रस्तुत किया जिसे सुनकर ज़ूम पर सभी आर्य श्रोता मंत्रमुग्ध हो गये।
कार्यक्रम का कुशल संचालन परिषद अध्यक्ष अनिल आर्य ने किया।

गायक एवम् गायिकाओं में रविन्द्र गुप्ता जी, के डी अरोड़ा, प्रवीणा ठक्कर, प्रतिभा कटारिया, कुसुम भण्डारी, संतोष धर, शोभा बत्रा एवम् कमला हंस जी आदि ने विषय-अनुरूप मधुर गीत प्रस्तुत किये।अंत में श्रीमती कुसुम भण्डारी जी ने मण्च संयोजक अनिल आर्य के निर्देशानुसार शान्ति-पाठ और जयघोष के साथ सभा का समापन किया।


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