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सरकार सरकार शराब बेचे और शिक्षक जागरुकता लाए, स्कूलों के आसपास शराब की दुकानें क्यों?

शिक्षक छात्रों को नशे से दूर रखें, लेकिन स्कूलों के आसपास शराब की दुकानें खोलने की अनुमति क्यों? ‘समाज जागरण’ का सवाल—क्या शराबबंदी पर गंभीरता से विचार नहीं कर सकतीं सरकारें?

समाज जागरण विशेष

नई दिल्ली। शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के शिक्षकों से छात्रों को नशे की बुराई से बचाने, उनके व्यवहार में होने वाले बदलाव पर नजर रखने और उन्हें रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करने की अपील की है। प्रधानमंत्री की यह चिंता निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—जब सरकारें युवाओं को नशे से दूर रखने की जिम्मेदारी शिक्षकों और परिवारों पर डाल रही हैं, तो फिर स्कूलों और शिक्षण संस्थानों के आसपास शराब की दुकानें खोलने की अनुमति क्यों दी जाती है?

प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित शिक्षकों से बातचीत के दौरान कहा कि शिक्षकों को छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन के साथ-साथ उनके व्यवहार और रोजमर्रा के जीवन पर भी ध्यान देना चाहिए। उन्होंने नशे की समस्या का उल्लेख करते हुए शिक्षकों से जागरूकता फैलाने तथा बच्चों के व्यवहार में बदलाव दिखाई देने पर सतर्क रहने की अपील की।

प्रधानमंत्री की इस अपील का उद्देश्य स्पष्ट है—देश के बच्चों और युवाओं को नशे की गिरफ्त से बचाना। लेकिन जमीनी हकीकत कई जगह इससे बिल्कुल अलग दिखाई देती है। कई स्थानों पर स्कूल-कॉलेजों के आसपास ही शराब की दुकानें संचालित होती दिखाई देती हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस बच्चे को शिक्षक नशे से बचाने के लिए समझा रहे हैं, उसके आसपास नशीले पदार्थों की उपलब्धता को रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?

स्कूल से 100 मीटर की दूरी पर शराब की दुकान, सवालों के घेरे में व्यवस्था

‘समाज जागरण’ सरकार और प्रशासन से सीधा सवाल पूछना चाहता है—जो छात्र पढ़ने के लिए 5 से 10 किलोमीटर दूर स्कूल या कॉलेज तक पहुंच सकता है, क्या वह शराब खरीदने के लिए 100 मीटर की दूरी तय नहीं कर सकता?

बच्चे को नशे से बचाने के लिए शिक्षक लगातार जागरूकता अभियान चलाएं, अभिभावक अपने बच्चों पर नजर रखें और समाज उन्हें संस्कार तथा सही दिशा देने का प्रयास करे, यह जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ यदि उसी बच्चे के आसपास शराब आसानी से उपलब्ध हो, तो केवल शिक्षक और परिवार से ही पूरी जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा कितनी व्यावहारिक है?

यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है। यह परिवार, शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।

छात्र पिए या कोई वयस्क, नुकसान पूरे परिवार का

शराब का प्रभाव केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता जो उसका सेवन करता है। नशे की आदत से परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है, घरेलू विवाद बढ़ सकते हैं, स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है और बच्चों के मानसिक एवं सामाजिक विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

यही वजह है कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल स्कूलों में भाषण और जागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रह सकती। नशे की उपलब्धता, बिक्री, प्रचार और सामाजिक स्वीकार्यता—इन सभी पहलुओं पर एक साथ काम करना होगा।

प्रधानमंत्री ने शिक्षकों से बच्चों का बचपन जीवंत बनाए रखने की अपील की है। यह जिम्मेदारी निश्चित रूप से शिक्षकों की है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या बच्चों का बचपन सुरक्षित रखना केवल शिक्षकों का दायित्व है?

सरकारें शराब से राजस्व कमाएं या पीढ़ियों को नशे से बचाएं?

देश के कई राज्यों के बजट में शराब से मिलने वाला आबकारी राजस्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकारों के सामने राजस्व और सामाजिक हित के बीच संतुलन की चुनौती रहती है। लेकिन क्या इस चुनौती का समाधान शराब की दुकानों की संख्या और उपलब्धता बढ़ाना ही है?

‘समाज जागरण’ का सवाल सरकारों से है—क्या शराब से मिलने वाले राजस्व के विकल्प तलाशकर शराबबंदी की दिशा में गंभीरता से विचार नहीं किया जा सकता?

यदि सरकारें मानती हैं कि नशा समाज के लिए गंभीर समस्या है, तो नशे के खिलाफ केवल जागरूकता अभियान क्यों? स्कूलों और कॉलेजों के आसपास नशे की उपलब्धता को पूरी तरह रोकने, बिक्री व्यवस्था की कड़ाई से निगरानी करने और युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए कठोर नीतिगत कदम क्यों नहीं उठाए जाने चाहिए?

शिक्षक अकेले नहीं बचा सकते बच्चों का भविष्य

शिक्षक बच्चे को समझा सकते हैं, अभिभावक उसकी निगरानी कर सकते हैं और समाज उसे सही संस्कार दे सकता है। लेकिन यदि आसपास का वातावरण ही नशे को आसानी से उपलब्ध कराता रहे तो इन प्रयासों की प्रभावशीलता सीमित हो सकती है।

इसलिए प्रधानमंत्री की अपील को केवल शिक्षक दिवस का संदेश मानकर आगे बढ़ जाने के बजाय इसे नीति और व्यवस्था में बदलाव की शुरुआत बनाया जाना चाहिए।

बच्चों से नशे से दूर रहने की अपील जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि समाज उनसे यह सवाल न पूछे कि वे नशे के पास क्यों गए—बल्कि व्यवस्था यह सुनिश्चित करे कि नशा बच्चों के आसपास पहुंचे ही नहीं।

अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि शिक्षक छात्रों को नशे से कैसे बचाएं। बड़ा सवाल यह है कि सरकारें ऐसा माहौल कब बनाएंगी, जहां बच्चों को नशे से बचाने के लिए हर दिन संघर्ष ही न करना पड़े?


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