समाज जागरण पटना जिला संवाददाता:- वेद प्रकाश
पटना/ बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व राज्य में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) को लेकर चल रहे कानूनी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग की इस प्रक्रिया को पूर्णतः संवैधानिक, वैध और निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक करार दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें इस प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाए रखना उसकी वैधानिक जिम्मेदारी है। अदालत ने टिप्पणी की कि एसआईआर प्रक्रिया का उद्देश्य लोकतंत्र की मूल भावना को मजबूत करना है, न कि किसी के लोकतांत्रिक अधिकार को बाधित करना। कोर्ट ने इसे जनप्रतिनिधित्व कानून के अनुरूप बताते हुए कहा कि फर्जी, दोहरी प्रविष्टि और स्थानांतरित मतदाताओं को हटाना चुनाव की विश्वसनीयता के लिए अनिवार्य है।
दस्तावेजों के सत्यापन पर अदालत ने महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए कहा कि आधार कार्ड नागरिकता का नहीं, बल्कि केवल पहचान का प्रमाण है, जिसे मतदाता सत्यापन में स्वीकार किया जा सकता है। जिन लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं, उनके लिए कोर्ट ने राहत देते हुए निर्देश दिए कि ऐसे मामलों को चार सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा जाए। प्रभावित व्यक्तियों को सुनवाई का पूरा अवसर मिलना चाहिए और यदि वे नागरिकता साबित करते हैं, तो उनके नाम पुनः सूची में जोड़े जाएं। निर्वाचन आयोग द्वारा 1 अक्टूबर 2025 को जारी अंतिम सूची के अनुसार, राज्य में मतदाताओं की संख्या घटकर 7.42 करोड़ रह गई है।
इस प्रक्रिया में 69.29 लाख नाम हटाए गए, जबकि 21.53 लाख नए मतदाता जुड़े। आयोग के अनुसार, हटाए गए नामों में मुख्य रूप से मृत, स्थानांतरित और दोहरे नाम शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से निर्वाचन आयोग को बड़ी राहत मिली है, लेकिन बिहार की राजनीति में इस पर बहस और तेज होने के आसार हैं। विपक्षी दल पहले से ही इसे वोटिंग अधिकारों से वंचित करने की साजिश करार देते रहे हैं। अब देखना यह है कि चुनाव से ठीक पहले जारी इस नई मतदाता सूची का आगामी विधानसभा चुनाव पर क्या प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक दलों की नजरें अब इस सूची के चुनावी गणित पर टिकी हैं।
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