दैनिक समाज जागरण अनील कुमार संवाददाता नबीनगर (औरंगाबाद)
नबीनगर (बिहार)नबीनगर प्रखंड के कांडी गांव में रामरेखा नदी के तट पर स्थित प्राचीन मां गजेन्द्रेश्वरी देवी मंदिर क्षेत्र के लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र है। नवीनगर शहर से करीब 6 किमी दूर स्थित इस मंदिर से जुड़ी कई लोकमान्यताएं और ऐतिहासिक किस्से प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व ग्रामीणों के सहयोग से इस मंदिर की स्थापना हुई थी।स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि वर्तमान नवीनगर क्षेत्र का प्राचीन नाम “चनकप गढ़” था, जहां पहले महास्थान समाज के लोग रहते थे। मान्यता है कि वर्षों पूर्व एक परिवार जंगल में सुरक्षित और ऊंचे स्थान की तलाश में कांडी गांव के टीला नुमा स्थल पर पहुंचा। वहां भगवान गणेश का स्मरण कर “कंडी” गाड़कर बस गया।
धीरे-धीरे यह जगह “गणेश कंडी” कहलाई, जो बाद में कांडी गांव बना।गांव बसने के बाद लोगों को कुल देवता की पूजा के लिए बार-बार चनकप गढ़ जाना पड़ता था। इस परेशानी को दूर करने के लिए वहां स्थित प्राचीन सोखा बाबा मंदिर परिसर की मिट्टी लाकर कांडी में प्रतिमा स्थापित की गई। उसी दौरान कुछ दूरी पर देवी पिंडी की स्थापना हुई, जो आगे चलकर मां गजेन्द्रेश्वरी देवी मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुई।ग्रामीणों में मान्यता है कि एक बार रामरेखा नदी में भीषण बाढ़ आई और पूरा गांव डूबने की कगार पर पहुंच गया था। संकट में लोगों ने देवी मां से रक्षा की गुहार लगाई, जिसके बाद बाढ़ का पानी थम गया। तभी से माता को ग्राम देवी के रूप में पूजा जाने लगा। मंदिर परिसर में स्थित विशाल पीपल वृक्ष को लोग लगभग 300 वर्ष पुराना मानते हैं। कहा जाता है कि सोखा बाबा की स्थापना के कई दशक बाद यह वृक्ष लगाया गया था। आज भी यह वृक्ष मंदिर की प्राचीनता का प्रतीक बना हुआ है।पुराना मंदिर जर्जर हो जाने के बाद विक्रम संवत 2060 एवं शक संवत 1945, आषाढ़ कृष्ण नवमी, सोमवार 12 जून 2023 को इसका पुनर्स्थापन कराया गया।वर्तमान में यह मंदिर मां गजेन्द्रेश्वरी देवी के रूप में प्रतिष्ठित है। यहां हर साल स्थापना दिवस पर भव्य श्रृंगार और पूजा का आयोजन होता है।



