google-site-verification: google2b21991adbe5cec3.html

बच्चों में मोबाइल की लत को लेकर राज्य सरकार ने जताई चिंता

स्क्रीन टाइम नियंत्रण के लिए बनेगी नई नीति

समाज जागरण पटना जिला संवाददाता:- वेद प्रकाश

पटना/ बिहार में बच्चों के बीच तेजी से बढ़ती मोबाइल की लत को लेकर राज्य सरकार ने गंभीर रूप से चिंता जताई है। विधानसभा में इस मुद्दे पर चर्चा के बाद सरकार ने इसे स्वास्थ्य व सामाजिकता से जुड़ा गंभीर विषय मानते हुए नई नीति तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने और डिजिटल लत से बचाने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने की तैयारी की जा रही है। पश्चिम चंपारण जिले के सिकटा से जनता दल यूनाइटेड के विधायक समृद्ध वर्मा ने विधानसभा में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया।

उन्होंने कहा कि आज गांवों से लेकर शहरों तक बच्चे घंटों मोबाइल फोन पर वीडियो देखने, सामाजिक माध्यम चलाने और ऑनलाइन खेल खेलने में व्यस्त रहते हैं। खासकर छोटे बच्चों में छोटी-छोटी वीडियो क्लिप देखने और लगातार स्क्रीन स्क्रॉल करने की आदत तेजी से बढ़ रही है। विधायक ने कहा कि इसका सीधा असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई और सामाजिक व्यवहार पर पड़ रहा है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि आयु वर्ग के अनुसार स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय की जाए और इस दिशा में ठोस नीति बनाई जाए।


राज्य की सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ने सदन में जवाब देते हुए कहा कि बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम चिंताजनक है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए बिहार सरकार बहुविभागीय दृष्टिकोण अपनाएगी। इस पहल में सूचना प्रौद्योगिकी, शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग मिलकर काम करेंगे। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि विशेषज्ञ सलाह के लिए बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान से संपर्क किया गया है।

संस्थान से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर बच्चों के लिए वैज्ञानिक और व्यवहारिक दिशा-निर्देश तैयार किए जाएंगे।उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी इस मुद्दे पर सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास सरकार की प्राथमिकता है। इस दिशा में सभी संबंधित विभागों के साथ समन्वय कर व्यापक नीति तैयार की जा रही है और जल्द ही ठोस कदम उठाए जाएंगे। सदन में चर्चा के दौरान विधायक समृद्ध वर्मा ने मोबाइल की लत को अदृश्य महामारी करार दिया। उन्होंने कहा कि लगातार वीडियो देखने और गेम खेलने से बच्चों के मस्तिष्क में डोपामाइन नामक रसायन का स्तर बढ़ जाता है, जिससे उनकी एकाग्रता प्रभावित होती है। धीरे-धीरे बच्चे पढ़ाई और अन्य रचनात्मक गतिविधियों में रुचि खोने लगते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब सरकार बच्चों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी आधुनिक तकनीकों की शिक्षा देने की योजना बना रही है, तो उन्हें डिजिटल लत से बचाने की रणनीति बनाना भी जरूरी है।

विधायक ने सुझाव दिया कि स्कूलों के पाठ्यक्रम में डिजिटल स्वच्छता को शामिल किया जाए। इसके माध्यम से बच्चों को मोबाइल और इंटरनेट के संतुलित उपयोग के बारे में जागरूक किया जा सकेगा। उन्होंने जिला स्तर पर डिजिटल लत से प्रभावित बच्चों के उपचार के लिए विशेष परामर्श केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव भी रखा। इसके अलावा जीविका समूहों के माध्यम से गांव-गांव जागरूकता अभियान चलाने की सिफारिश की गई, ताकि अभिभावकों को भी बच्चों के मोबाइल उपयोग पर निगरानी और संतुलन के महत्व के बारे में जानकारी मिल सके। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक मोबाइल उपयोग बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, नींद, व्यवहार और शैक्षणिक प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों की समस्या, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और सामाजिक अलगाव जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में सरकार की प्रस्तावित नीति को बच्चों के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

सरकार की योजना में स्कूलों और परिवारों की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। नीति लागू होने के बाद अभिभावकों और शिक्षकों को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए जाएंगे, ताकि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित कर सकें। संतुलित डिजिटल उपयोग को बढ़ावा देने और वैकल्पिक गतिविधियों के प्रति बच्चों को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जाएगा। राज्य सरकार की यह पहल डिजिटल युग में संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। आने वाले समय में यदि यह नीति प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो बच्चों को स्वस्थ, सुरक्षित और संतुलित वातावरण प्रदान करने में मदद मिल सकती है।


Discover more from समाज जागरण

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

🛍️ Today’s Best Deals

(Advertisement)