बिभूति भूषण भद्र दैनिक समाज जागरण झाड़ग्राम जिला संवाददाता
भारतीय संस्कृति में हर त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।वहीँ इन त्यौहारों का विशेष महत्व भी होता है। बात रोशनी के पर्व दीपावली की हो तो यह और भी खास हो जाता है। दीपावली पर घरौंदा बनाए जाने की परंपरा सदियों पुरानी है। कार्तिक महीने में घर की साफ सफाई में लोग जुट जाते हैं और दीपावली आगमन पर घरों में घरौंदा का निर्माण करते हैं। सामान्य तौर पर दीपावली के अवसर पर अविवाहित लड़कियां घरौंदा का निर्माण करती है। ताकि उनका घर भरा भरा रहे। दीपावली के मौके पर गणेश लक्ष्मी की पूजा के साथ-साथ बेटियां घरौंदा एवं रंगोली बनाकर उसकी पूजा करती है। अब जमाना काफी हाईटेक हो गया है कि धीरे-धीरे आज की नई पीढ़ी परंपराओं को पीछे छोड़ती जा रही है। लोग आगे बढ़ाने की होड़ में अपनों के साथ-साथ रिती रिवाज भी भूलते जा रहे हैं।दीपावली में धनतेरस के दिन से ही कुबेर पूजा, आभूषण बर्तन खरीद, लक्ष्मी गणेश पूजा, घरौंदा भरना, रंगोली बनाना आदि परंपराएं निभानी शुरू हो जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम वनवास के बाद नगर आगमन से ही उनकी नगरी फिर बसी है। इसी को देखते हुए लोगों ने घरौंदा बनाकर उसे सजाने का प्रचलन हुआ। इसे प्रतीकात्मक रूप से नए नगर के बेसन को लेकर देखा जाता है। आमतौर पर घर की लड़कियां घरौंदा को बनाने और सजाने का काम करती है।दिवाली पर मिट्टी से बने दिये और खिलौने का प्रचलन है। घरौंदा को सजाने के लिए कुल्हिया चुकिया का इस्तेमाल किया जाता है। और लड़कियां इसमें फरही, मिष्ठान और अन्न आदि भरती है। ऐसी मान्यता है कि भविष्य में वह जब कभी भी वह दांपत्य जीवन में प्रवेश करें, तो उनका संसार भी सुख समृद्धि से भरपूर रहेगा। जैसे धनतेरस के दिन से ही घर में दिये जलने शुरू हो जाते हैं। उसी तरह घरौंदा में भी शाम के समय दिए जलाए जाते हैं। रंग बिरंगे से रंगोली बनाई जाती है। घरौंदा में दिये जलाने के साथ लक्ष्मी गणेश की पूजा भी करते हैं। जिससे घर में खुशहाली आती है। समय के साथ-साथ घरौंदा में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। अब बाजार में मिट्टी व लकड़ी से बनाए घरोंदे भी बिकने लगे हैं।
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