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आदिवासी संस्कृति को मजबूती प्रदान करने में जनजातीय नृत्य कार्यशाला सहायक माध्यम होगी।

समाज जागरण अनिल कुमार
हरहुआ वाराणसी। विलुप्त हो रही गोंडी नृत्य आदिवासी संस्कृति को मजबूती प्रदान करने में जन जातीय नृत्य कार्यशाला सहायक माध्यम होगी।
उक्त बातें उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति कला संस्कृति संस्थान (संस्कृति विभाग) व जनजातीय शोध एवं विकास संस्थान वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में गनेशपुर ,हरहुआ में आयोजित दस दिवसीय ‘जन जातीय नृत्य कार्यशाला’ का आदिवासी नायक बिरसा मुंडा के चित्र पर माल्यार्पण व दीप प्रज्वलन कर उद्घाटन अवसर पर मुख्य अतिथि महेंद्र प्रसाद वरिष्ठ समाजसेवी ने अपने उद्बोधन में व्यक्त किया।
विशिष्ट अतिथि बुधिराम गोंड ,बाबूलाल पटेल सहित अन्य अतिथियों ने चित्र पर माल्यार्पण किया।
वक्ताओं ने कहा कि दस दिवसीय जनजातीय नृत्य कार्यशाला में जनजातीय समाज की विलुप्त होती गोंडी नृत्य, कर्मा एवं शैला नृत्य को गहनता पूर्वक सिखाया जाएगा। जिसे सीखकर आदिवासी संस्कृति को मजबूती प्रदान करने में सहायक होगी। वर्तमान में जनजातीय समाज की अनेक संस्कृति विलोपन के कगार पर है जिसे उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान, सस्कृति विभाग, लखनऊ के प्रयास से जीवन्त करने का कार्य किया जा रहा है।
कार्यशाला के प्रशिक्षक विनोद कुमार गोंड एवं सहायक दिलीप ने प्रतिभागियों को प्रथम दिन में जनजातीय नृत्य को कब, कैसे और किस पर्व एवं त्योहार पर किया जाता है, जिसे सहजता पूर्वक प्रतिभागियों को बताया।
कार्यशाला में बृजभान ‘मरावी’ सचिव/प्रबंधक-जनजातीय शोध एवं विकास संस्थान, वाराणसी ने कहा कि दस दिवसीय कार्यशाला के माध्यम से जनपद की दुर्लभ गोंडी जनजातीय नृत्य-गीत की बारिकियों को रोचात्मक बनाकर मंच पर कैसे प्रस्तुत किया जाए इस तरह से प्रशिक्षित किया जाएगा। और नये उम्र के बच्चों को सिखाया जाएगा।
कार्यशाला में प्रियका गोंड, विजयलक्ष्मी गोंड, आचल गोंड, बलिराम, प्रितम गोंड, रंजीत गोंड सहित कई ने प्रतिभाग किया।


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