आदिवासी समाज की आवाज बुलंद करने वाले अग्रणी नेताओं में शुमार थे विजय सिंह.
विजय कुमार अग्रहरी/ ब्यूरो चीफ, समाज जागरण
सोनभद्र। उत्तर प्रदेश की अंतिम विधानसभा 403 दुद्धी सीट के आदिवासी राजनीति के पितामह कहे जाने वाले विजय सिंह गोंड़ के निधन से पूरा सोनभद्र जनपद और आसपास के क्षेत्रों में शोक की लहर दौड़ गई. समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और दुद्धी विधायक विजय सिंह गोंड़ का लखनऊ के एसपीजी आई में इलाज के दौरान बृहस्पतिवार को निधन हो गया. उनके निधन की पुष्टि दुद्धी विधानसभा अध्यक्ष अवध नारायण यादव ने की. वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे और उनकी दोनों किडनी खराब हो गई थी, जिसके चलते उन्हें कई दिनों पहले एसपीजीआई में भर्ती कराया गया था. उत्तर प्रदेश विधानसभा की अंतिम सीट 403 दुद्धी जनजाति के लिए आरक्षित है.
इस सीट पर विजय सिंह गोंड़ का शुरू से वर्चस्व रहा है. वह यहां से कुल आठ बार विधायक रहे. इसमें अलग-अलग पार्टियों से सात बार वह लगातार जीत हासिल की. मुलायम सिंह यादव की सरकार में राज्य मंत्री भी रहे. दो बार आरक्षण के चलते चुनाव मैदान से भले ही दूर हुए, लेकिन जीत उसी की हुई, जिसे विजय सिंह का समर्थन मिला. वर्ष 2017 और 2022 के चुनाव में मामूली वोटों से हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन 2024 में हुए उपचुनाव में फिर विधायक की कुर्सी पाने में कामयाब रहे. वर्ष 1977 में जनता पार्टी के ईश्वर प्रसाद विधायक निर्वाचित हुए थे निर्वाचित हुए थे. कांग्रेस से पहली बार विजय सिंह गोंड़ 1980 में विधायक बने. 1985 में कांग्रेस, 1989 में निर्दल, 1991 और 1993 में जनता दल,1996 और 2002 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर विजय सिंह गोंड़ लगातार जीतते रहे. मुलायम सिंह यादव का सरकार में राज्य मंत्री भी रह चुके हैं. उनकी पहचान मजबूत आदिवासी नेता के रूप में रही है. वर्ष 2007 और 2012 के चुनाव में आरक्षण के चलते ऐन वक्त पर चुनाव मैदान से बाहर होने के बाद भी विजय सिंह ने अपनी राजनीतिक पकड़ का प्रदर्शन करते हुए समर्थित प्रत्याशी को जीत दिलाई थी. वर्ष 2017 में अपना दल- एस के हरिराम चेरो ने 1085 मतों से हराया था.
वहीं 2022 के चुनाव में भाजपा के रामदुलार गोंड़ ने उन्हें 6725 वोटों के अंतर से मात दी थी. नाबालिक से दुष्कर्म के मामले में रामदुलार के अयोग्य होने के बाद वर्ष 2024 में उपचुनाव हुआ था. सत्ताधारी दल की ओर से पूरी ताकत लगाने के बावजूद विजय सिंह गोंड़ 3018 वोटों के अंदर से जीत दर्ज करने में कामयाब रहे और आठवीं बार दुद्धी विधानसभा के विधायक चुने गए. दुद्धी और ओबरा विधानसभा को अनुसूचित जनजाति सीट घोषित कराने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी. बनवासी से आश्रम में सिर्फ 200 रूपए मासिक मानदेय पर कार्यरत रहते हुए उन्होंने आदिवासियों के हक में लड़ाई लड़ी. उनके निधन से पूरा सोनभद्र जनपद सहित दुद्धी विधानसभा क्षेत्र सहित आसपास के इलाकों में शोक की लहर दौड़ गई।



