25,000 कुण्डीय स्वर्वेद ज्ञान महायज्ञ में उमड़ा श्रद्धा का जनसागर
समाज जागरण रंजीत तिवारी
रामेश्वर वाराणसी।।
स्वर्वेद महामंदिर धाम की पावन भूमि पर आज मानो दिव्यता उतर आई। 25,000 यज्ञ–ज्वालाओं का सामूहिक प्रकाश, वैदिक मंत्रों की अनुगूँज और असंख्य श्रद्धा–कणों का स्पंदन इस क्षण को अद्वितीय बना रहा था। महायज्ञ में उपस्थित यज्ञानुरागियों को संबोधित करते हुए सन्त प्रवर श्री विज्ञान देव जी महाराज ने कहा कि यज्ञ सनातन संस्कृति की आत्मा है, इसी में वैदिक धर्म की जड़ें और जीवन बसता है।
यज्ञ श्रेष्ठतम शुभ कर्म है। यज्ञ का अर्थ है त्याग भाव। अग्नि की ज्वाला सदैव ऊपर की ओर उठती है अग्नि को बुझा सकते हैं, पर झुका नहीं सकते।

वैसे ही हमारा जीवन भी ऊर्ध्वगामी रहे श्रेष्ठ, पवित्र और कल्याणकारी पथ पर निरंतर गतिशील।
महाराज श्री ने स्पष्ट किया
हमारे अंतःकरण में ज्ञान की अग्नि,शरीर में कर्म की अग्नि,
इंद्रियों में तप की अग्नि और विचारों में सद्भावना की अग्नि जलती रहे।
यज्ञ की अग्नि हमें अशुभ का दहन और शुभ का पोषण सिखाती है।
उन्होंने कहा कि यज्ञ केवल मनोकामनाओं की सिद्धि या पर्यावरण शुद्धि केवल नहीं है, बल्कि यह हमारे अन्तर्मन में त्याग और विश्वमानव–भावना को विकसित करता है
“मैं और मेरा” से ऊपर उठकर ‘विश्व–कल्याण’ की भावना जगाता है।
यज्ञ केवल अग्नि में आहुति नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, लोभ और अशुद्धियों को समर्पित करने का पवित्र साधन है।
सन्त प्रवर श्री ने आज के समय की एक गम्भीर चुनौती—ग्लोबल वॉर्मिंग का उल्लेख करते हुए कहा यज्ञ इसे रोकने का एक सशक्त वैदिक उपाय है। पर्यावरण–चिन्तकों को इस दिशा में गम्भीरता से अध्ययन करना चाहिए।
उन्होंने बताया प्राचीन ऋषियों के आश्रमों में प्रतिदिन यज्ञ की परंपरा थी, और आज के समय में यह पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। यज्ञ एवं योग के सामंजस्य से ही विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है।
महाराज जी ने यह भी स्पष्ट किया कि यज्ञ का धुँआ कोई प्रदूषित गैस नहीं है; यह आयुर्वेदिक जड़ी–बूटियों से उत्पन्न दिव्य धूम्र है, जो स्वास्थ्य लाभ एवं पर्यावरण शुद्धि दोनों प्रदान करता है।
भव्य एवं आकर्षक ढंग से सजी 25,000 यज्ञ वेदियों में वैदिक मन्त्रोच्चारण के बीच
लाखों दम्पत्तियों ने एक साथ भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के निमित्त आहुतियाँ प्रदान कीं।
यज्ञ के पश्चात् सद्गुरु देव एवं सन्त प्रवर श्री के दर्शन हेतु भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ा।
सन्त प्रवर श्री विज्ञान देव जी महाराज एवं आचार्य श्री स्वतंत्र देव जी महाराज की दिव्य उपस्थिति में सम्पन्न इस महायज्ञ ने वातावरण को केवल सुगंधित नहीं किया, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा यज्ञ को पुनः जन–जन के हृदय में प्रज्ज्वलित कर दिया।
इस महायज्ञ की पवित्रता ऐसी थी कि इसका वातावरण केवल स्वर्वेद महामंदिर धाम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि काशी के सम्पूर्ण परिवेश में आध्यात्मिक निर्मलता और दिव्यता का प्रसार करने लगा।
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