बिहार जैसे गरीब राज्य में जहाँ किसान अपनी फसल के दाम पर आँसू बहा रहे हों, वहाँ एक “अनपढ़ अमीन” महाशय का दैनिक वेतन ₹3000 तय हो जाना किसी चमत्कार से कम नहीं। गाँव का मास्टर साहब जिनकी पूरी तनख्वाह ₹25,000 महीने है, वही अब सोचते होंगे – काश! हम भी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर अमीन बन गए होते।
ग्रामीण किसान बेचारे हल-बैल सँभालते रह जाते हैं और जब ज़मीन नापने का वक्त आता है तो अमीन जी धूप का चश्मा लगाकर पहुँचते हैं – “मालिक, ₹3000 रोज़ का खर्चा लगेगा।” किसान हक्का-बक्का, “ई रोज़ तो हमका आधा बीघा बेच देबे पड़ी।”
बात यहीं खत्म नहीं होती। कई जगह तो “दैनिक वेतन” के अलावा “चाय पानी” और “पान-गुटखा शुल्क” भी अलग से जोड़ दिया जाता है। यानी नापी से ज़्यादा खर्चा तो अमीन की भूख पूरी करने में हो जाता है।
अब ज़रा सोचिए, जिस राज्य में गरीब किसान बीज-खाद की कीमत चुकाने में पसीना बहा रहा हो, वहाँ अमीन जी का वेतन किसी बड़े इंजीनियर से भी टक्कर लेने लगे। तो भला किसान कहाँ से राहत पाएगा?
हकीकत यह है कि अमीन का डंडा ज़मीन नहीं नापता, बल्कि गरीब जनता की जेब नाप लेता है।



