दैनिक समाज जागरण अनील कुमार संवाददाता नबीनगर (औरंगाबाद)
नबीनगर (बिहार) नबीनगर में पुनपुन नदी दम तोड़ रही है।या यूं कहे कि अपने अस्तित्व को लेकर आशु बहा रही है। पुनपुन नदी का उद्गम स्थल नबीनगर प्रखंड के टंडवा के समीप झारखंड के कुंड नामक स्थान से हुई है। टंडवा से लेकर नबीनगर तक पुनपुन नदी नदी न होकर नाले के रूप में परिवर्तित हो गई है। वहीं पुनपुन नदी के दोनों छोर अतिक्रमण का शिकार है। नवीनगर बाजार क्षेत्र में होटल का कचरा,घरों का कचरा,नालियों का पानी और शहर की गंदगी सीधे नदी में गिराई जा रही है। नतीजा कभी निर्मल जल वाली “आदि गंगा” कही जाने वाली पुनपुन आज कचरे और बदबू का ढेर बन गई है।पूरे नदी क्षेत्र जलकुंभी जैसे खर पतवार से पटा पड़ा है।नदी के किनारे अवैध बने पक्के निर्माण और अवैध कब्जा बढ़ने से नदी का रास्ता लगातार सिकुड़ता जा रहा है। पुनपुन नदी केवल नदी नहीं है बल्कि आस्था का भी प्रतीक है।
पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध-तर्पण सबसे पहले इसी नदी के जल से होता है। स्थानीय लोग का कहना है “हम खुद अपनी धरोहर को खत्म कर रहे हैं”। नदियों को बचाने के लिए “नमामि गंगे”, “स्वच्छ भारत मिशन”, “स्वच्छ नदी योजना” – करोड़ों का बजट है। पर नवीनगर में जमीनी हकीकत अलग है। पुनपुन नदी के अस्तित्व को बचाने और इसकी महिमा को लेकर टंडवा में पुनपुन महोत्सव का आयोजन विगत कई वर्षों से होते आ रहा है और अब यह महोत्सव कला एवं संस्कृति विभाग बिहार सरकार और जिला प्रशासन के सौजन्य से मनाया जा रहा है।फिर भी यह महोत्सव केवल मनोरंजन तक ही सीमित है। टंडवा से लेकर नबीनगर तक न कचरा संग्रहण की उचित व्यवस्था, न अतिक्रमण पर कार्रवाई। योजना फाइलों तक सीमित है ।आने वाली पीढ़ी स्वच्छ पुनपुन देख पाएगी या सिर्फ किस्सों में सुनेगी -ये फैसला प्रशासन को लेना है।
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