1974 से कब्जे का दावा, कई प्रशासनिक व न्यायिक आदेश पक्ष में आने के बावजूद बेदखली की कोशिश; निष्पक्ष जांच की मांग
वीरेंद्र चौहान, समाज जागरण ब्यूरो किशनगंज।
29 जुलाई। जिले के ठाकुरगंज प्रखंड से सामने आया एक भूमि विवाद अब केवल दो पक्षों के बीच का मामला नहीं रह गया है, बल्कि राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली और भूमि प्रबंधन व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। पीड़ित का आरोप है कि वर्षों से उनके कब्जे वाली पुश्तैनी एवं खतियानी भूमि को कथित फर्जी दस्तावेजों और संदिग्ध राजस्व प्रक्रियाओं के सहारे विवादित बनाने तथा कब्जा करने का प्रयास किया जा रहा है।
ठाकुरगंज निवासी जैनुद्दीन उर्फ कोठी का दावा है कि वर्ष 1974 से संबंधित भूमि पर उनके परिवार का वैध कब्जा है। उक्त भूमि पर उनका मकान, गोदाम तथा चारदीवारी बनी हुई है। इसके बावजूद कुछ लोगों द्वारा कथित रूप से डुप्लिकेट एवं फर्जी दस्तावेजों के आधार पर स्वामित्व का दावा किया जा रहा है।
पीड़ित के अनुसार, इस विवाद को लेकर उन्होंने वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी है। उनका कहना है कि जिलाधिकारी, अपर समाहर्ता, धारा 144 की कार्यवाही सहित अन्य प्रशासनिक एवं न्यायिक मंचों से उन्हें राहत मिल चुकी है, लेकिन इसके बावजूद विवाद समाप्त नहीं हुआ और उन्हें लगातार बेदखल करने की कोशिश की जा रही है।
जैनुद्दीन का आरोप है कि विरोधी पक्ष ने गलत तरीके से भूमि की रसीद कटवाने तथा राजस्व अभिलेखों में परिवर्तन कराने का प्रयास किया। उनका सवाल है कि जब विरोधी पक्ष वैध स्वामित्व का प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका, तब राजस्व अभिलेखों में बदलाव की प्रक्रिया किस आधार पर आगे बढ़ी और इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
पीड़ित ने स्थानीय राजस्व प्रशासन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि जांच के दौरान उनके दस्तावेजों और आपत्तियों पर निष्पक्षता से विचार नहीं किया गया। उनका कहना है कि यदि जांच पारदर्शी और निष्पक्ष होती तो वर्षों पुराना यह विवाद अब तक समाप्त हो चुका होता।
मामले ने एक और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। कानून के जानकारों के अनुसार निजी संपत्ति के विवाद में किसी भी सरकारी कर्मी को कानून से परे जाकर किसी पक्ष को कब्जा दिलाने या बलपूर्वक हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। भूमि विवादों का समाधान केवल सक्षम न्यायालय अथवा अधिकृत राजस्व प्राधिकार के आदेशों के अनुरूप ही होना चाहिए। इसके बावजूद यदि कोई अधिकारी अपनी वैधानिक सीमा से बाहर जाकर कार्रवाई करता है तो ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि भूमि विवादों के कारण आम नागरिक वर्षों तक कोर्ट-कचहरी और सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन मामलों का समयबद्ध समाधान राजस्व प्रशासन की निष्पक्ष कार्रवाई से संभव है, उनका निपटारा वर्षों तक लंबित क्यों रखा जाता है? यदि राजस्व अभिलेखों की पारदर्शी जांच हो और जिम्मेदारी तय की जाए तो ऐसे अधिकांश विवाद प्रारंभिक स्तर पर ही समाप्त हो सकते हैं।
पीड़ित ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन से पूरे मामले की जांच किसी स्वतंत्र एवं वरिष्ठ अधिकारी से कराने, सभी राजस्व अभिलेखों, रसीदों तथा संबंधित दस्तावेजों की फोरेंसिक एवं प्रशासनिक जांच कराने तथा यदि किसी स्तर पर अनियमितता या मिलीभगत पाई जाती है तो संबंधित दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने की मांग की है।
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