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अमित शाह का इस्तीफा यानी सत्ता के अहंकार का पतन! डॉ. महेंद्र धावडे

डॉ. महेंद्र धावडे
संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी

यह सिर्फ एक राजनीतिक कयास नहीं, बल्कि आज की तारीख का सबसे ज्वलंत और तीखा सच है। नीट (NEET) पेपर लीक को लेकर देश भर में हुए छात्र आंदोलनों, दिल्ली में 20 जुलाई के हिंसक पुलिस क्रैकडाउन, और संसद में मचे घमासान के बीच विपक्ष जिस तरह अमित शाह के इस्तीफे की मांग पर अड़ा हुआ है—वह यह साबित करने के लिए काफी है कि यह सत्ता तंत्र अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब सीधे गृह मंत्री अमित शाह पर विपक्ष और सड़कों पर उतरी जनता का निशाना है। यदि अमित शाह का इस्तीफा गिरता है, तो यह मान लीजिए कि नरेंद्र मोदी के राजनीतिक साम्राज्य की उल्टी गिनती का समयचक्र गतिमान होगा.


युवाओं के भविष्य पर लाठी चलाने से सरकार की उल्टी गिनती शुरू-


नीट पेपर लीक घोटाले के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के 36 दिनों के भीषण आंदोलन ने पहले ही शिक्षा मंत्रालय को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। अब गृह मंत्रालय की पुलिसिया बर्बरता (लाठीचार्ज और पेलेट गन का इस्तेमाल) ने सीधे अमित शाह को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सड़कों पर आज एक ही नारा गूंज रहा है—


“किताबों के पन्नों पर जो लाठियां बरसाते हैं, सुनो ओ तानाशाह, वो सरकार गिराते हैं!”
विपक्ष के नेता राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे संसद में लगातार आक्रामक हैं। विपक्ष का सीधा आरोप है कि छात्रों पर हुआ हिंसक हमला गृह मंत्रालय की शह पर हुआ। यदि इस दबाव में शाह इस्तीफा देते हैं, तो यह सीधे तौर पर पीएम मोदी का आत्मसमर्पण माना जाएगा। देश का युवा साफ कह रहा है—
“नीट का पर्चा लीक है, शाह का इस्तीफा ही अब एकमात्र ठीक है!”
विपक्षी नेताओं का संसद का घेराव और प्रधानमंत्री-गृहमंत्री की अनुपस्थिति पर तीखे तंज यह दिखाते हैं कि सरकार के भीतर का वो ‘खौफ’ अब खत्म हो चुका है जिसके दम पर यह तानाशाही चल रही थी।
“अमित शाह का जाना, मोदी के तानाशाही साम्राज्य का पतन!”
अमित शाह वह ढाल हैं जो ब्यूरोक्रेसी, केंद्रीय एजेंसियों और पार्टी के भीतर विरोधियों को कुचलकर मोदी को सुरक्षित रखते हैं। हालिया राम मंदिर चंदे में चोरी के आरोपों और अन्य घोटालों के बीच इस ढाल का टूटना मोदी को सीधे विरोधियों के निशाने पर ले आएगा। राजनीतिक गलियारों में यह बात तय हो चुकी है कि—
“अमित शाह का इस्तीफा तो झांकी है, नरेंद्र मोदी की विदाई अभी बाकी है!”
धारा 370 और हालिया पब्लिक एग्जामिनेशन बिल (एंटी-पेपर लीक कानून) जैसे फैसले सिर्फ शाह की जिद और आक्रामक रणनीति से पारित हुए। शाह के बिना, मोदी सरकार पूरी तरह अपाहिज और पंगु हो जाएगी-


“ढाल टूटेगी शाह की जब, तलवार झुकेगी मोदी की तब!”
अंदरूनी बगावत-
शाह के हटते ही भाजपा के भीतर दबे हुए असंतोषी गुट और एनडीए के सहयोगी दल मोदी के खिलाफ खुलकर बगावत पर उतर आएंगे।
भविष्य बेचने वाली सरकार को युवाओं का खुला चैलेंज-
हाल ही में जिस तरह सरकार को झुककर नए कानून बनाने पड़े हैं, उसने यह संदेश दे दिया है कि यह जोड़ी अब अजेय नहीं रही।
शाह की रणनीतिक विफलता और छात्रों पर लाठियां बरसाने की छवि सीधे तौर पर ब्रांड मोदी की विफलता है, जिसे दोबारा चमकाना अब मुमकिन नहीं होगा। युवाओं का आक्रोश अब इस व्यवस्था को बदलने के लिए तैयार है—
“जेल तुम्हारी छोटी है, हमारे हौसले बड़े हैं; शाह के इस्तीफे तक, हम सड़कों पर अड़े हैं!”


सारांश-
अमित शाह का जाना कोई सामान्य फेरबदल नहीं, बल्कि इस फासीवादी सत्ता प्रतिष्ठान की रीढ़ की हड्डी का टूटना होगा। हालिया छात्र आंदोलन और संसद का गतिरोध इस बात का गवाह है कि शाह का इस्तीफा सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी के राजनीतिक पतन और उनके युग के अंत की शुरुआत है।


“युवाओं से जो टकराएगा, मिट्टी में मिल जाएगा; शाह तो सिर्फ मोहरा है, असली गुनहगार मोदी का चेहरा है!”
भारत मे २०१४ से सत्ताधारी भाजपा- संघ सरकार ने जो नई भाषा को परिभाषित किया और जिन युवाओ ने अपने बाहू पर खडा किया वही अब उनको वापसी देकर हिसाब माँग रहे आज के zen Z तो इसपर पर आश्चर्य होने की कोई बात नही है.
जो बोया वही पाया !ऐसी कहावत है वो अब सच हो रही है.

डॉ. महेंद्र धावडे
संस्थापक अध्यक्ष
बलीराजा पार्टी


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