🖋️ कटाक्ष
पाकिस्तान ने बड़े शोर-शराबे के साथ सीपीईसी का ढोल पीटा था—“60 अरब डॉलर आएँगे, रेलगाड़ियाँ फर्राटे भरेंगी, ग्वादर चमकेगा और एशिया में नई तरक्की का सूरज उगेगा”। मगर नतीजा? चीन ने ऐन समय पर हाथ खींच लिया और अब इस्लामाबाद एडीबी की चौखट पर जाकर फरियाद कर रहा है—“भाई, 2 अरब डॉलर उधार दे दो, वरना रेल की पटरियाँ जंग खा जाएँगी।”

ये हाल वैसा ही है जैसे मोहल्ले का कोई शख़्स शान से एलान करे कि “मैं 6 मंज़िला कोठी बनवा रहा हूँ”, और सालों बाद भी नींव में बारिश का पानी ही जमा मिले।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ़ बीजिंग से लौटे तो बस कागज़ों पर लिखे समझौता ज्ञापन साथ लाए—कृषि, सौर ऊर्जा और इस्पात में वादों की फेहरिस्त। लेकिन असली सवाल ये है कि जिन वादों पर पाकिस्तान ने भरोसा किया, वो अब केवल “कागज़ी पुल” साबित हो रहे हैं।
चीन ने साफ़ कर दिया है कि “दोस्ती अपनी जगह, पर पैसे अब हिसाब देखकर ही मिलेंगे”। दूसरी ओर पाकिस्तान का बयान—“हम एक दोस्त के लिए दूसरे को नहीं छोड़ेंगे”—सुनने में तो अच्छा है, मगर असलियत ये है कि दोस्ती अब रिश्तों से ज़्यादा बही-खाते की नज़र से देखी जा रही है।
सीपीईसी का हाल दरअसल उसी शादी जैसा है, जिसमें बारात मर्सिडीज़ से निकले, दूल्हा घोड़ी पर चढ़े, बैंड-बाजा बजे, लेकिन मंडप पर पहुँचते ही दुल्हन शादी से इनकार कर दे। अब बेचारे बाराती (पाकिस्तान) एडीबी के पंडाल में ढोलक बजाने को मजबूर हैं।
👉 कुल मिलाकर, सीपीईसी सपनों की वो हवाई जहाज़ निकली जो टेकऑफ़ से पहले ही रनवे पर पंक्चर हो गया।
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