दैनिक समाज जागरण 11.07.2026 चांद कुमार लायेक (ब्यूरो चीफ) पूर्वी सिंहभूम जमशेदपुर
जमशेदपुर हिन्दू नववर्ष यात्रा के संस्थापक मृत्युंजय कुमार ने झारखंड सरकार द्वारा क्लस्टर सिस्टम के नाम पर राज्य के विभिन्न महाविद्यालयों में संस्कृत विभागों को बंद किए जाने के निर्णय पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे केवल एक शैक्षणिक निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परंपरा पर सीधा हमला बताया है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारत की आत्मा है और इसके अस्तित्व पर संकट पैदा करना देश की सांस्कृतिक विरासत को कमजोर करने जैसा है।
मृत्युंजय कुमार ने कहा कि संस्कृत केवल एक विषय या भाषा भर नहीं है, बल्कि यह भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा की आधारशिला है। देश के वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत तथा अनेक धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथ संस्कृत भाषा में ही रचे गए हैं। भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की जड़ें संस्कृत में समाहित हैं। ऐसे में संस्कृत विभागों को बंद करना आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से दूर करने का प्रयास प्रतीत होता है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत को विश्व की सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक भाषाओं में गिना जाता है। आधुनिक भाषाविद् भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप की अधिकांश भाषाओं की उत्पत्ति और विकास में संस्कृत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिंदी सहित अनेक भारतीय भाषाओं के शब्द भंडार और व्याकरण पर संस्कृत की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। यदि संस्कृत के अध्ययन और शिक्षण को कमजोर किया जाता है, तो इसका प्रभाव केवल एक भाषा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय भाषाई और सांस्कृतिक संरचना पर भी पड़ेगा।
मृत्युंजय कुमार ने आरोप लगाया कि क्लस्टर सिस्टम की आड़ में चुन-चुनकर संस्कृत विभागों को बंद किया जा रहा है, जो गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के नाम पर यदि पारंपरिक और सांस्कृतिक विषयों को समाप्त किया जाएगा, तो यह समाज के लिए दूरगामी और नकारात्मक परिणाम लेकर आएगा। सरकार को शिक्षा सुधार और संसाधनों के बेहतर उपयोग के साथ-साथ सांस्कृतिक और भाषाई संरक्षण को भी समान महत्व देना चाहिए।
उन्होंने कहा, “संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी आस्था और हमारी परंपरा का प्रतीक है। जब किसी समाज की भाषा कमजोर होती है, तो उसकी संस्कृति और इतिहास भी धीरे-धीरे विलुप्त होने लगते हैं। इसलिए संस्कृत विभागों का बंद होना केवल विद्यार्थियों या शिक्षकों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज और राष्ट्र से जुड़ा विषय है।”
समाज के सभी वर्गों से अपील करते हुए मृत्युंजय कुमार ने कहा कि यह समय जागरूक और संगठित होने का है। उन्होंने अभिभावकों, विद्यार्थियों, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों से इस विषय पर गंभीरता से विचार करने और संस्कृत भाषा के संरक्षण के लिए आगे आने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि यदि आज समाज मौन रहा, तो भविष्य में अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचा पाना कठिन हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि यह संघर्ष किसी एक कॉलेज, विश्वविद्यालय या जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे झारखंड की सांस्कृतिक अस्मिता और पहचान से जुड़ा हुआ प्रश्न है। राज्य सरकार को चाहिए कि वह विद्यार्थियों, शिक्षकों और समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस निर्णय पर पुनर्विचार करे तथा बंद किए गए संस्कृत विभागों को पुनः संचालित करने की दिशा में सकारात्मक पहल करे।
मृत्युंजय कुमार ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि शीघ्र ही संस्कृत विभागों को बहाल नहीं किया गया, तो राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा, “सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि संस्कृत और संस्कृति पर किसी भी प्रकार का प्रहार समाज स्वीकार नहीं करेगा। यदि बंद किए गए संस्कृत विभागों को जल्द से-जल्द पुनः बहाल नहीं किया गया, तो व्यापक और उग्र आंदोलन खड़ा किया जाएगा, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी सरकार की होगी।”
उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। यदि समाज अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं के प्रति सजग रहेगा, तभी आने वाली पीढ़ियों तक भारत की गौरवशाली विरासत सुरक्षित रूप से पहुंच सकेगी।
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