दुसरो की ढूंढो तो अपनी खुद लौट आती हैँ

एक बार टीचर ने एक अनोखा प्रयोग किया—हर बच्चे को एक गुब्बारा दिया और बोला इसपर अपना नाम लिखो और गलियारे में फेंकते जाओ। बच्चों ने गुब्बारा फुलाया, अपना नाम लिखा और उसे गलियारे में फेंक दिया।



कुछ मिनटों बाद…
पूरा गलियारा रंग-बिरंगे गुब्बारों से भर चुका था।

टीचर ने कहा—“अब 5 मिनट में अपना-अपना गुब्बारा ढूँढो।”

सैकड़ों गुब्बारे, हर बच्चा दौड़ रहा था, घबराहट, अफरा-तफरी, कुछ तो फट भी जा रहे थे…पर नतीजा?
एक भी स्टूडेंट अपना गुब्बारा नहीं ढूँढ पाया।

टीचर मुस्कुराई और उन्होंने कहा—“अच्छा बच्चों, अब एक काम करो…जो पहला गुब्बारा मिले, उस पर जो नाम लिखा है, उसे जाकर उस बच्चे को दे दो।”

और देखते ही देखते—5 मिनट के भीतर हर बच्चे के हाथ में उसका गुब्बारा वापस था।

टीचर ने उस दिन ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक बच्चों को सिखाया जो आज हमसब को भी सीखना चाहिए—

“खुशियां गुब्बारे की तरह है…जब हम सिर्फ अपनी तलाश करते हैं, हम उसे खो देते हैं।
लेकिन जब हम दूसरों की खुशी ढूँढ़ने लगते हैं, तो हमारी अपनी खुशी खुद हमारे पास लौट आती है।”

वही सुकून, वही आनंद हमें तब मिलता है जब हम किसी और का हाथ थामकर उसे ऊपर उठाते हैं।

अगर इस दुनिया में थोड़ी भी अच्छाई बची है, तो वो सिर्फ इसी वजह से—क्योंकि कुछ लोग अपनी नहीं, दूसरों की खुशी ढूँढते हैं।

वैसे आपको कैसा लगता है—जब आप दूसरों की मदद करते हैं?

साभार संतोष भारतवंशी सोशल मीडिया

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