चिल्हनियां पंचायत में जिला स्तरीय टीम ने की स्थलीय जांच, शिलापट्ट नहीं मिलने से उठे सवाल; अभिलेखों और भुगतान की जांच से खुलेगा मामला
वीरेंद्र चौहान, समाज जागरण ब्यूरो, किशनगंज।
टेढ़ागाछ। किशनगंज जिले के टेढ़ागाछ प्रखंड की चिल्हनियां पंचायत में मनरेगा योजनाओं में कथित अनियमितता की शिकायत पर मंगलवार को जिला स्तरीय जांच टीम ने विभिन्न कार्यस्थलों का निरीक्षण किया। पंचायत के सरपंच कैलाश बोसाक ने जिला पदाधिकारी नवीन कुमार को आवेदन देकर योजनाओं में गड़बड़ी की जांच कराने की मांग की थी। डीएम के निर्देश पर पहुंची टीम में डीआरडीए के निदेशक शशिम सौरभ मणि और कनीय अभियंता राहुल कुमार शामिल थे। जांच के दौरान निजी जमीन पर मिट्टी भराई कर बनाए गए रास्ते के नाम पर मनरेगा की राशि निकासी किए जाने का आरोप सामने आया। अब यह जांच का विषय है कि संबंधित कार्य के नाम पर सरकारी राशि की निकासी किन परिस्थितियों में और किन अभिलेखों के आधार पर की गई।
चिल्हनियां पंचायत के वार्ड संख्या 15 निवासी रामेश्वर यादव, पिता स्वर्गीय सोहन लाल यादव ने जांच टीम को लिखित आवेदन देकर बताया कि उन्होंने वर्ष 2022-23 में संबंधित जमीन खरीदी थी। उसी वर्ष आवागमन की सुविधा के लिए अपनी निजी जमीन पर अपने खर्च से मिट्टी भराई कर रास्ते का निर्माण कराया था। उनका दावा है कि इस कार्य में किसी सरकारी योजना का इस्तेमाल नहीं किया गया और न ही सरकारी राशि खर्च की गई।
रामेश्वर यादव के अनुसार, 13 अक्टूबर 2026 को जांच के लिए पहुंचे अधिकारियों से उन्हें जानकारी मिली कि उनके निजी खर्च से बनाए गए रास्ते के नाम पर पहले मनरेगा योजना की राशि की निकासी की गई है। इसके बाद उन्होंने जांच टीम को आवेदन सौंपकर मामले की जांच कराने और वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। टीम ने उनका आवेदन प्राप्त कर संबंधित तथ्यों को जांच के दायरे में लिया।
निजी जमीन पर निजी खर्च से रास्ता बनाए जाने के दावे और उसी रास्ते के नाम पर मनरेगा की राशि निकासी के आरोप के बीच का अंतर जांच का प्रमुख बिंदु है। यदि सरकारी अभिलेखों और स्थल निरीक्षण से आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह योजना के क्रियान्वयन, कार्य की वास्तविकता और सरकारी राशि के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े करेगा। हालांकि, जांच रिपोर्ट आने से पहले किसी भी अनियमितता को प्रमाणित मानना उचित नहीं होगा।
शिलापट्ट नहीं मिलने से अभिलेखों की जांच जरूरी
पंचायत में मनरेगा योजनाओं के तहत कराए गए कार्यों के स्थलों पर संबंधित शिलापट्ट नहीं मिलने की बात भी सामने आई है। इससे योजनाओं की पहचान, स्वीकृत राशि और कार्य से जुड़ी जानकारी के सत्यापन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में केवल स्थल निरीक्षण पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित योजनाओं की प्रशासनिक स्वीकृति, कार्यादेश, मापी पुस्तिका, मजदूरों की उपस्थिति, भुगतान विवरण और वास्तविक कार्यस्थल का सरकारी रिकॉर्ड से मिलान करना जरूरी है।
अब जिला स्तरीय जांच टीम की रिपोर्ट पर निगाहें टिकी हैं। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित रास्ते के नाम पर मनरेगा योजना स्वीकृत हुई थी या नहीं, राशि किसके खाते में और किन अभिलेखों के आधार पर भेजी गई तथा सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज कार्य और मौके की वास्तविक स्थिति में कोई अंतर है या नहीं। जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही मामले में जिम्मेदारी तय हो सकेगी और कथित अनियमितता की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।
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