समाज जागरण
विश्वनाथ त्रिपाठी
व्युरो चीफ प्रतापगढ़
वैसे तो पत्रकारिता हमेशा से एक जोखिम भरा कार्य रहा है लेकिन सरकारी अमला न तो इनसे चिढ़ता था और नहीं समाचार छपने के बाद बदले की भावना से काम करता था | मेरे पत्रकारिता के पचास वर्ष के अनुभव यह अवश्य बताते हैं कि भ्रष्टाचार का जो माहौल आज है वह पहले इतने बड़े पैमाने पर नहीं दिखता था | नेता ईमानदार हुआ करता था, अखबारो मे नाम छपने पर उसे गौरव बोध होता था क्यो कि उसका नाम अच्छेकामों की गणना मे छापा जाता था | समय बदलता गया नेता और अधिकारियो की युगलबंदियां शुरू हुई नौकरशाह नेताओं को धन कमाने का गुर सिखाने लगा | यहीं से भ्रष्टाचार की नींव पड़ने लगी लेकिन उन्हें अखबार बालों से डर लगता था क्योकि खबर लिखनेवाला न तो स्वार्थी होता था और न ही लालची | वह भी खबर आज की तरह हवा मे नहीं पुख्ता सबूतों के आधार पर लिखा करता था | उसकी लेखनी इतनी दमदार हुआ करती थी कि देश के बड़े वहदेदार उसके सामने बौने हुआ करते थे | पुलिस की कोई औकात नहीं थी कि एक पत्रकार पर हाथ क्या उंगली उठा दे | लेकिन इस देश की अफसरशाही और नेतागीरी दोनो ने मिलकर एक पत्रकार की कलम को लालच के शिकंजे मे कसकर उसे बंधक बना दिया |
अब पत्रकार भी चकाचौंध की दुनिया का पुजारी बनने लगा कलम की पवित्रता नाले का कीचड़ बनने लगी | गली मुहल्लों मे शराब की दूकानों की तरह पत्रकारिता भी बिकने लगी | अब कलमकार की जगह हाकर संवाददाता बनाए जाने लेगे | अखबार मिशन नहीं व्यापार की राह पर बढ़ निकला | कुछ पूंजीपति भी अखबार उद्योग मे कूद पड़े और सरकार की लचर नितियों ने इस पवित्र पेशे को गंदे नाले की तरह विभिन्न प्रकार के वैक्टेरिया से पोषित कर दिया |
आज भी प्रयागराज का एक ऐसा दैनिक अखबार है जो बाजार या पाठकों के पास नहीं पहुचता फिर भी प्रदेश सरकार के यहाँ प्रतिष्ठित अखबारो की श्रेणी मे स्थान पाकर प्रतिमास लाखो का विज्ञापन प्राप्त करता है |
अब आता हूं मूल विंदु पर कि पलिसवाले पत्रकारो से चिढ़ते क्यों है? पहले एक कहावत कही जाती थी चोर चोर मौसेरे भाई, लेकिन यहाँ कहावत के उलट है ये भाई नहीं एक दूसरे के दुश्मन हैं | पलिसवाले महकमा लूट के लिए बदनाम तो है ही | वह लत्ते को सांप व सांप लत्ता बनाने मे माहिर होता है, इधर हाकरछाप पत्रकार भी चा पाई से उठते ही डायरी पेन लेकर थाने के सामने चाय पानी की दूकान पर बैठ कर अपना उल्लू सीधा करने की जुगत मे लग जाते है कुछ तो इतने बेशर्म होते है जो सिपाही तक को नहीं बख्शते | चाय पीने के लिए पैसे मांग लेते है | ऐसे ही पत्रकार पुलिस के लिए सिर दर्द बन जाते है और मौका मिलते ही पुलिस वाला सबक सिखाने मे बिलम्ब नहीं करता | ये तो रहा एक आम पहलू जिसे हर आदमी दर किनार कर देता है |
वास्तविकता तो यह है कि जो वास्तविक कलमकार है वह पुलिस वालों के लिए चौबीस
घंटे खौफ बना रहता है |
यह खौफ थानाध्यक्ष पर अधिक होता है जैसा इस समय संग्राम गढ़ देखा व सुना जा रहा है | यहाँ प्रतिदिन कोई न कोई गम्भीर अपराध हो रहे है जिसे महोदय रिपोर् न लिखकर छुपाने का प्रयास करते आ रहे हैं |अपराधियों से मिलकर अपराध के बढ़ावे मे भी पुलिस का हाथ रख ता है इससे भी इनकार नही किया जा सकता | रिश्वत लेकर केस की लीपापोती इनका जन्मसिद्ध अधिकार है | ऐसे प्रवृत्ति वाले पुलिस कर्मी क्षेत्रीय संवाद दादा पर रिश्वत के डोरे डालते हैं | इस काम मे जब विफल होते रहते है और जब पुलिस के गंदे कारनामे अखबार की सुर्खियां बनते हैं तब तिलमिलाया पुलिस महकमा उनकी चड्डी उतार वाने का मन बनाता है, स्थानीय नेताओं को साधता है क्यो कि दोनो भ्रष्टाचारी एक छोटी सी कलम से आये दिन शर्मसार हुआ करते हैं |
भाइयों बात यहीं नही रुकती एक कलम का सिपाही कितनी जलालत झेलता है आप को अंदाजा नही होगा |
कोटेदार से लेकर मंत्री तक की निगरानी रखने वाला यह पत्रकार नाम का जीव अब किसी को अच्छा नही लगता | इसकी तीखी कलम के जाल मे कब, कोन फंस जायेगा यह स्वयं को भी नहीं पता रहता | इसलिए रेवाड़ी से लेकर ऊपर तक के लोग तंग है भला पुलिस वाला कब चाहेगा उसकी बेइज्जती हो |