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महाराष्ट्र: SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम में बदलाव – प्राथमिक जांच के बाद ही गिरफ्तारी

मुंबई/समाज जागरण ब्यूरो

महाराष्ट्र में सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाट ने आज विधान परिषद में एक महत्वपूर्ण घोषणा की है। मंत्री ने बताया कि अब SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम (PoA Act) के तहत शिकायत मिलने पर तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी। गिरफ्तारी केवल प्राथमिक समिति की जांच और अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर प्रथम दृष्टया दोष सिद्ध होने पर की जाएगी।

मंत्री शिरसाट ने स्पष्ट किया कि इस कदम का उद्देश्य झूठी या गलत शिकायतों के कारण निर्दोष व्यक्तियों की गिरफ्तारी रोकना और कानून के सही, प्रमाण आधारित कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना है।

उन्होंने यह भी बताया कि कानून में पहले से ही प्रावधान है कि यदि कोई झूठी शिकायत या गलत आरोप दर्ज कराता है, तो उस पर जुर्माना या जेल की सजा लगाई जा सकती है। इसके लिए अधिकारियों और जांच अधिकारियों को रिपोर्ट और प्रमाण के आधार पर उचित कार्रवाई करनी होगी।

इस बदलाव से कानून के क्रियान्वयन में पारदर्शिता बढ़ेगी और दोनों पक्षों—पीड़ित और आरोपित—के अधिकारों का न्यायसंगत संरक्षण होगा।

मंत्री का यह बयान 14 मार्च 2026 का ताज़ा अपडेट है और विधानमंडल में हुई चर्चा पर आधारित है। राज्य सरकार का कहना है कि यह बदलाव कानून के मूल अधिकारों को कमजोर किए बिना, केवल प्रक्रिया और जांच में सुधार लाने के लिए किया गया है।

विडियो मराठी मे है और उसका हिंदी मे एआई के मदद से किया गया है। विडियो नीचे लिंक मे दी गई है

1. मौजूदा कानूनी प्रावधान (IPC और BNSS)

यद्यपि SC/ST एक्ट में विशेष रूप से “झूठी शिकायत” के लिए अलग से सजा का प्रावधान नहीं है, लेकिन भारतीय न्याय संहिता (BNS) [पूर्व में IPC] के तहत कार्रवाई की जा सकती है: 

  • BNS धारा 240 (पूर्व में IPC 203): यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी अपराध के बारे में झूठी सूचना देता है, तो उसे सजा दी जा सकती है।
  • BNS धारा 231 (पूर्व में IPC 211): किसी व्यक्ति को झूठा फंसाने के इरादे से कानूनी कार्यवाही शुरू करने पर भी सजा का प्रावधान है।
  • सरकारी मुआवजे की वसूली: हाल के अदालती फैसलों (जैसे लखनऊ कोर्ट, अक्टूबर 2025) में यह देखा गया है कि झूठी शिकायत करने वालों को जेल की सजा दी गई और उनसे सरकारी मुआवजा वापस लेने का आदेश भी दिया गया। Devgan.inDevgan.in +4

2. प्रस्तावित प्रशासनिक बदलाव

संजय शिरसाट के अपडेट के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार निम्नलिखित कदम उठा रही है:

  • अनिवार्य प्राथमिक जांच: अब सीधे FIR और गिरफ्तारी के बजाय, एक समिति या जांच अधिकारी (IO) पहले मामले की सत्यता की जांच करेगा। यदि मामला झूठा पाया जाता है, तो FIR दर्ज ही नहीं होगी।
  • पुलिस समरी (B-Summary): यदि पुलिस जांच में पाती है कि शिकायत गलत इरादे से की गई थी, तो वे कोर्ट में ‘B-Summary’ रिपोर्ट दाखिल कर सकते हैं, जिससे केस खत्म हो जाता है और झूठी शिकायत करने वाले पर कार्रवाई का रास्ता खुलता है। Divya MarathiDivya Marathi

3. मुख्य चुनौतियां

  • कानून का मूल उद्देश्य: केंद्र सरकार और अदालतों का मानना रहा है कि इस एक्ट में झूठी शिकायत पर सख्त सजा का प्रावधान करने से असली पीड़ित डर सकते हैं, जिससे कानून का मुख्य उद्देश्य (कमजोर वर्गों की रक्षा) प्रभावित हो सकता है।
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया है कि निर्दोषों को बचाना जरूरी है, लेकिन एक्ट के कड़े प्रावधानों को पूरी तरह कमजोर नहीं किया जा सकता। YouTubeYouTube +4

निष्कर्ष: सरकार “प्रशासनिक स्तर” पर गिरफ्तारी से पहले जांच अनिवार्य करके दुरुपयोग को काफी हद तक नियंत्रित कर सकती है। हालांकि, शिकायतकर्ता को सजा दिलाने के लिए उसे अलग से BNS की धाराओं के तहत कोर्ट में दोषी सिद्ध करना होगा, जो एक लंबी प्रक्रिया है। LinkedInLinkedIn +1

क्या आप जानना चाहते हैं कि यदि किसी पर झूठा केस हो जाए, तो वह अपने बचाव के लिए कौन से कानूनी विकल्प अपना सकता है?

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