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महाप्रबंधक कार्यालय में लगातार 2 घंटे तक चली बैठक नहीं बनी सहमति

किसानों ने कहा कल सुबह 9:00 बजे करेंगे खदान को बंद प्रबंधन में हड़कंप

ग्राम पंचायत अतरिया और बिछिया के सरपंचों ने सोपे ज्ञापन जब तक मुद्दे हल नहीं तब तक कोई बैठक नहीं रामपुर बटुरा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। जब प्रशासन और जनप्रतिनिधि किसी समस्या को लेकर बैठक करते हैं, लोगों की बात सुनते हैं, समाधान का भरोसा देते हैं और समय-सीमा तय करते हैं, तब प्रभावित लोगों के मन में एक नई उम्मीद जन्म लेती है। यही उम्मीद संघर्ष को संयम में बदलती है और विरोध को विश्वास में परिवर्तित करती है
आज बैठक की मैं मुख्य रूप से अनूपपुर जिला पंचायत के जिला अध्यक्ष श्रीमती प्रीति रमेश सिंह की विशेष उपस्थिति रही बैठक में महाप्रबंधक महोदय बी के जैना साहब के निर्देशानुसार धार्मिक प्रबंधक श्री आर के चतुर्वेदी के द्वारा 18 जून 2026 को होने वाले पर्यावरण जनसुनवाई बैठक के पूर्व तैयारी के लिए अपने चारों ग्राम पंचायत के सरपंच उप सरपंच सहित जिला पंचायत जनपद पंचायत के प्रतिनिधियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाई थी जबकि जैसे ही पत्र जारी हुआ उसके बाद से ही प्रतियोगियों ने अपने गांव की जनता से सलाह मांगी जब सलाह करने बैठे ग्रामीणों ने कहा कि हम भी सुनना चाहते हैं कि क्या बात होती है जहां 10 लोगों की बैठक होनी थी वहां सैकड़ो की संख्या में जनप्रतिनिधियों के सहित किसानों ने बैठक में सम्मिलित हुए यहां तक की बी हाल पूरा फुल होने की बात कुछ किसानों को खड़ा रहना पड़ा
और रामपुर बटुरा क्षेत्र के भू-आश्रित परिवारों के साथ भी वर्षों से यही प्रक्रिया दोहराई जा रही है। उनकी समस्याओं को लेकर बैठकों का आयोजन होता है, मांगों पर चर्चा होती है, अधिकारियों द्वारा आश्वासन दिए जाते हैं और समाधान का भरोसा दिलाया जाता है। किसान और प्रभावित परिवार भी इन बातों पर विश्वास करते हुए अपने आंदोलन और विरोध को स्थगित कर देते हैं। वे इस उम्मीद में रहते हैं कि अब उनकी समस्याओं का समाधान होगा।
बैठक में 18 जून की बैठक की सहमति पर पूरी तरह से विचार नहीं बन पाई कुछ लोगों का हां तो ज्यादा लोगों का मान रहा है आने वाले 18 तारीख के पहले ही किसानों की नाराजगी इतनी ज्यादा है कल सुबह ठीक 9:00 बजे खदान को बंद करने की चेतावनी देकर किस वापस करके सबसे ज्यादा प्राइवेट कंपनियों के विषय में यही नाराजगी रामपुर के चारों तरफ से प्राइवेट कंपनियों का हमला हो चुका है बुहारियों का भारती ज्यादा स्थानीय को प्राथमिकता नहीं इसको लेकर घर नाराज की व्यक्त की गई उसके साथ ही वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता पूर्व एसडीएम श्री रमेश सिंह सर के मुद्दे को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त किया उन्होंने कहा जितने हमारे क्षेत्र में काम ग्रुप रेखा बनाई गई है जीएम साहब से निवेदन है उसकी निगरानी और स्वयं करें
बैठक में मुख्य रूप से जय अंबे कंपनी का मुद्दा छाया रहा एक तरफ 450 लोगों की भर्ती हो चुकी है रामपुर के बेरोजगार भटक रहे हैं जो लोग बाहर से आए हैं उन्हें ना तो बीटीसी कराया गया ना ही मेडिकल परीक्षण कराया गया आज सीधी भर्ती कर दी गई वहीं रामपुर के लिए आए दिन बीटीसी और मेडिकल परीक्षण की बात करके झूठा शासन दिया जा रहा है केवल इतना ही नहीं जिन कुछ चंद लोगों की भर्ती की गई उन्हें वेतन के रूप में 300 से 500 दिया जा रहा है जबकि 1300 से ₹1500 तक दिन का मजदूरी भुगतान है
यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का विषय नहीं, बल्कि जनविश्वास की परीक्षा भी है। जब उम्मीदें बार-बार टूटती हैं, तब लोगों के भीतर निराशा और असंतोष का जन्म होना स्वाभाविक है।

सभी जनप्रतिनिधियों की बातचीत आने के बाद विजेता सरसों से लगातार संघर्षरत किसानों के मसीहा माने जाते क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता भूपेश शर्मा से आग्रह किया गया सभी विषयों पर प्रकाश डालें भूपेश शर्मा ने 12 अप्रैल को जो जिला कलेक्टर महोदय के जिला कलेक्टर महोदय के अध्यक्षता में की गई बैठक जिन बिंदुओं को प्रबंधन के द्वारा शासन दिया गया था उसे बैठक के प्रति सामने रखते हुए कहा यह पत्र का आपका बनाया हुआ है 3 महीना पूर्व में स्वतंत्र दिया गया था कि आने वाले 3 महीने में यह संपूर्ण काम हो जाएंगे जिसमें एक भी काम नहीं किया गया इस विषय पर नाराजगी व्यक्त करते हुए आपके द्वारा दिया गया जो आश्वासन है उसे पूरा कर लिए बैठक करिए खदान चलाइए लेकिन जब तक यह पूरा नहीं होता है तब तक के लिए खदान को बंद कर दिया जाएगा जिसकी जिम्मेदारी प्रबंधन की होगी

जब समाधान नहीं मिलता और लोग अपने अधिकारों की मांग को लेकर फिर से आवाज उठाते हैं, तब उनके आंदोलन पर सवाल खड़े किए जाते हैं। लेकिन वास्तविक प्रश्न आंदोलन नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों का होना चाहिए जिन्होंने आंदोलन को फिर से जन्म दिया।

आंदोलन किसी का विरोध मात्र नहीं होता। कई बार वह व्यवस्था को उसकी जिम्मेदारियों का स्मरण कराने का माध्यम होता है। यदि समस्याएं जस की तस बनी रहें और आश्वासन केवल कागजों या बैठकों तक सीमित रह जाएं, तो लोगों के भीतर असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।

लोकतंत्र में आवाज उठाना अधिकार है। अपने जीवन, रोजगार और भविष्य से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछना भी अधिकार है। ऐसे में आंदोलन को केवल विरोध की दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। इसे उन अधूरी उम्मीदों और टूटे भरोसों की अभिव्यक्ति के रूप में भी समझना होगा जो लंबे समय से समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

भरोसे से समाधान तक : आत्मचिंतन का समय प्रशासन और समाज दोनों के लिए

सामाजिक कार्यकर्ता भूपेश शर्मा का कहना है कि उन्होंने हमेशा मुद्दों की बात की है। उन्होंने कभी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए आवाज नहीं उठाई। उनका संघर्ष हमेशा जनहित और प्रभावित परिवारों की समस्याओं के समाधान के लिए रहा है। उनका मानना है कि अब समय आ गया है जब केवल आश्वासनों की राजनीति से आगे बढ़कर वास्तविक कार्यों की आवश्यकता है।

उनके अनुसार, लंबे समय से भू-आश्रित परिवार केवल आश्वासन सुनते आए हैं। उन्होंने विश्वास किया, इंतजार किया और हर बार उम्मीद की कि इस बार कुछ बदलेगा। लेकिन जब बार-बार वही स्थिति सामने आती है, तो लोगों का धैर्य भी जवाब देने लगता है। यह स्थिति केवल किसानों की नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए आत्मचिंतन का विषय है।

आत्मचिंतन का अर्थ केवल गलतियों को स्वीकार करना नहीं होता, बल्कि यह समझना भी होता है कि जनता की उम्मीदें किन कारणों से टूट रही हैं। यदि किसी समस्या के समाधान में बाधाएं हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से बताया जाना चाहिए। यदि कोई प्रक्रिया लंबित है, तो उसकी स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए। पारदर्शिता ही विश्वास को मजबूत करती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि बैठकों के निर्णयों को धरातल पर उतारने की ठोस कार्ययोजना बनाई जाए। समय-सीमा निर्धारित हो, उसकी नियमित समीक्षा हो और प्रभावित लोगों को प्रगति की जानकारी भी दी जाए। तभी आश्वासन भरोसे में बदलेंगे और भरोसा समाधान का मार्ग प्रशस्त करेगा।

धनपुरी और रामपुर बटुरा के भू-आश्रितों की यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है। यह उनके अधिकारों, सम्मान और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। यह विरोध नहीं, बल्कि अपने हक की मांग है। और जब तक उस मांग का न्यायपूर्ण समाधान नहीं होगा, तब तक सवाल उठते रहेंगे।

आज जरूरत आंदोलन को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि उन कारणों को समझने की है जिन्होंने आंदोलन की आवश्यकता पैदा की। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल आश्वासन देना नहीं, बल्कि उन्हें निभाना भी है। यही प्रशासनिक विश्वसनीयता की पहचान है और यही जनता के विश्वास की सबसे मजबूत नींव है
बैठक में उपस्थित किसानों ने अपने-अपने मुद्दे भी व्यक्तित्व रूप से महाप्रबंधक के पास निवेदन के रूप में रखा गया कड़े तेवर के साथ महाप्रबंधक महोदय ने अधिकारियों के निर्देशित किया विषय नोट करें अभिलंब कार्यवाही करें कल से ही चिट्ठी बनाएं
अंत में किसानों ने निश्चय किया कि हम बेरोजगारों के मुद्दों को हल नहीं किया जाएगा तो हम कल सुबह खदान को संपूर्ण रूप से बंद करेंगे क्योंकि हम इस विषय का ज्ञापन पिछले 3 तारीख को दे चुके हैं और इस पर कोई विचार नहीं किया गया है हमारे रोजगार के फाइलों को भी लंबित किया जा रहा है और जिनका रोजगार नहीं मिलने वाली है उन्हें प्राइवेट कंपनियों में भी जगह नहीं दी जाती है इसमें लेकर के घर नाराजगी व्यक्त किया गया


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