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मखमली आवाज़ के जादूगर सुखबीर सिंह ब्रोका

छत्तीसगढ़ के मोहम्मद रफी, संगीत के भगवान मानते हैं रफी साब को

सुनील चिंचोलकर
बिलासपुर,छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ की धरती प्रतिभाओं से भरी हुई है। यहां के कलाकार अपनी मधुर आवाज़ और संघर्षशील जीवन के बल पर पहचान बना रहे हैं। ऐसे ही एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं भिलाई के जाने-माने सिंगर, समाजसेवी और व्यवसाई सुखबीर सिंह ब्रोका, जिन्हें संगीत जगत में लोग “मखमली आवाज़ के जादूगर” के रूप में जानते हैं।

सुखबीर सिंह ब्रोका न केवल एक बेहतरीन गायक हैं, बल्कि एक सफल व्यवसायी और सक्रिय राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। उन्होंने अपने जीवन में अनेक संघर्षों का सामना करते हुए आज एक उच्च मुकाम हासिल किया है।

जीवन परिचय और शिक्षा

सुखबीर सिंह ब्रोका का जन्म दल्ली राजहरा में हुआ। उनके पिता महेंद्र सिंह जी समाजसेवी और पीडब्ल्यूडी तथा वन विभाग के प्रमुख ठेकेदारों में से एक थे। परिवार मूल रूप से पाकिस्तान के नूरपुर जिले से संबंध रखता है, जो देश के विभाजन के बाद भारत आया और दल्ली राजहरा में बस गया।

सुखबीर सिंह ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा निर्मला इंग्लिश मीडियम स्कूल, दल्ली राजहरा से प्राप्त की और आगे की पढ़ाई सेंट थॉमस कॉलेज, भिलाई से बी.कॉम में स्नातक की। उन्होंने आईसीडब्ल्यूए कोर्स भी किया तथा बाद में बालोद महाविद्यालय से कॉमर्स में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की।

परिवार और जीवन यात्रा

उनकी धर्मपत्नी सुरिंदर कौर एडवोकेट और नोटरी हैं। दोनोें संतानें शिक्षा और करियर में उच्च स्थान प्राप्त कर चुकी हैं। पारिवारिक दृष्टि से सुखबीर सिंह का घर भरा-पूरा और खुशहाल है।

भिलाई में स्थायी रूप से बसने के पीछे उनका प्रमुख उद्देश्य बच्चों की उत्तम शिक्षा था। उनका मानना है कि “भिलाई एक शिक्षा का हब है और यहां भारत के हर कोने से लोग मिलते हैं, जिससे यह शहर मिनी इंडिया कहलाता है।”

संगीत की शुरुआत

संगीत सुखबीर सिंह के लिए कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है।
उन्होंने कभी औपचारिक संगीत शिक्षा नहीं ली। यह केवल सरस्वती माता की कृपा और प्राकृतिक सुरों का वरदान है, जिससे उनकी आवाज़ में इतना जादू है।

बचपन से ही स्कूलों में गायन प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान प्राप्त करते रहे। कॉलेज के दिनों में उन्होंने पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय के यूथ फेस्टिवल में भी प्रतिनिधित्व किया।

कोविड काल के दौरान, जब परिवहन व्यवसाय ठप पड़ा, तब उन्होंने अपने संगीत प्रेम को पुनः जागृत किया। एक साउंड सेटअप खरीदा और ऑनलाइन कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करना शुरू किया। यही दौर उनके संगीत जीवन का नया अध्याय बना।

रफी और मुकेश से प्रेरणा

ब्रोका जी का झुकाव प्रारंभ में मुकेश चंद्र माथुर साहब की सधी और भावनात्मक गायकी की ओर था। वे कादर ऑर्केस्ट्रा के साथ कार्यक्रमों में मुकेश जी के गीत गाया करते थे।
भिलाई आने के बाद उन्होंने मोहम्मद रफी साहब के नग़्मों को आत्मसात किया और उन्हें अपना संगीतिक ईश्वर मान लिया। वे कहते हैं “मैंने मोहम्मद रफी साहब का दीदार कभी नहीं किया, लेकिन उनकी आवाज़ में मुझे भगवान की झलक मिलती है।”

उनका पसंदीदा गीत है “तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे…” जिसे वे अत्यंत भावपूर्ण ढंग से गाते हैं।

समाजसेवा और इंसानियत का संदेश

सुखबीर सिंह ब्रोका केवल कलाकार नहीं, बल्कि समाजसेवा में भी अग्रणी हैं। वे कहते हैं “कलाकार केवल गाना नहीं गाता, वह समाज को जोड़ने का काम करता है।” वे धर्म, जाति और संप्रदाय से ऊपर उठकर भारत की एकता के लिए हमेशा कार्य करते हैं। उनका प्रिय नारा है “हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई — सभी मिलकर भारत की एकता को बनाएंगे।” वर्तमान में समाजसेवा में निरंतर अग्रणी होते हुए भिलाई के प्रमुख गुरुद्वारा ,गुरुद्वारा नानकसर नेहरू नगर में महासचिव के पद पर रहते हुए साध संगत की सेवा सुचारू रूप से निभा रहे हैं।

वर्तमान समय पर विचार

हाल ही में पंजाब में आई बाढ़ पर दुख व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा “पंजाब मेरी मातृभूमि समान है। जालंधर और अमृतसर से मेरे ननिहाल के रिश्ते हैं। मैं प्रार्थना करता हूं कि वहां के लोग इस आपदा से शीघ्र उबरें और फिर से खुशहाल जीवन जिएं।”

ज़ज़्बे को सलाम
सुखबीर सिंह ब्रोका ने यह साबित कर दिया कि “प्रतिभा को मंच की नहीं, सच्चे जज़्बे की ज़रूरत होती है।” भिलाई के सुखबीर सिंह ब्रोका की मखमली आवाज़ को सुनने के बाद यही कहा जा सकता है “दुश्मन समझ रहा था कि हम डूब जाएंगे, हम एक हैं, हम एकता से जीत जाएंगे।”


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