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आरक्षित डिब्बों में सफर बना चुनौती, यात्रियों की सुरक्षा पर उठे सवाल

वीरेंद्र चौहान, समाज जागरण ब्यूरो, किशनगंज।
11 जून। भारतीय रेलवे यात्रियों को सुरक्षित, सुविधाजनक और सम्मानजनक यात्रा का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट नजर आ रही है। हालात ऐसे हैं कि कई ट्रेनों के कोच क्षमता से कहीं अधिक यात्रियों की भीड़ से भरे रहते हैं। रेलवे की व्यवस्थाएं लगातार सवालों के घेरे में हैं। कहीं यात्री ट्रेनों के दरवाजों पर लटककर जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं और आए दिन हादसों का शिकार हो रहे हैं, यात्रियों के बीच लगातार घटनाएं घटित हो रही है।तो कहीं आरक्षित डिब्बों में कन्फर्म टिकटधारी यात्रियों को भी अपनी सीट के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। संपर्क क्रांति एक्सप्रेस (22449) में सामने आई अव्यवस्थाओं ने रेलवे के दावों की एक बार फिर पोल खोल दी है।

किशनगंज से दिल्ली जा रही संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में सफर कर रही एक महिला यात्री ने बताया कि कन्फर्म आरक्षण होने के बावजूद उनकी सीट पर अन्य लोगों ने कब्जा जमा रखा था। कई बार अनुरोध और विरोध के बावजूद सीट खाली नहीं की गई। अपनी ही आरक्षित सीट पर बैठने के लिए उन्हें घंटों इंतजार करना पड़ा। इससे महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को सबसे अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।

यात्रियों के अनुसार ट्रेन में इतनी अधिक भीड़ थी कि डिब्बे के भीतर चलना-फिरना और शौचालय तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया था। शौचालय गंदगी से भरे हुए थे, जबकि एक शौचालय का कुंडा टूटा हुआ था। स्वच्छता और यात्री सुविधाओं के नाम पर रेलवे की व्यवस्थाएं पूरी तरह नाकाम साबित हुईं।

यात्रियों ने आरोप लगाया कि ट्रेन में रेल नीर की निर्धारित कीमत 15 रुपये होने के बावजूद उनसे 20 रुपये वसूले जा रहे थे। उनका कहना है कि जब रेलवे पूरा किराया और आरक्षण शुल्क वसूल रही है, तब बुनियादी सुविधाओं और निगरानी व्यवस्था का अभाव गंभीर चिंता का विषय है।

सबसे गंभीर बात यह रही कि पूरे सफर के दौरान न तो कोई टीटीई टिकट जांच के लिए पहुंचा और न ही रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) का कोई जवान दिखाई दिया। आरक्षित डिब्बों में अनधिकृत यात्रियों की भीड़ लगातार बढ़ती रही और यात्री खुद को असुरक्षित महसूस करते रहे, लेकिन उनकी शिकायत सुनने वाला कोई नहीं था। यात्रियों ने ट्रेनों के समय पालन पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अधिकांश ट्रेनें निर्धारित समय से करीब दो घंटे की देरी से चल रही हैं, जिससे उनकी परेशानियां और बढ़ जाती हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कन्फर्म टिकटधारी यात्री भी अपनी सीट, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं, तो रेलवे के दावों पर कैसे भरोसा किया जाए? आरक्षण का पूरा किराया वसूलने के बावजूद यदि यात्रियों को उनकी आरक्षित सीट, सुरक्षा और सम्मानजनक यात्रा सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, तो यह रेलवे की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

यात्रियों ने रेल मंत्रालय और रेलवे प्रशासन से मांग की है कि आरक्षित कोचों में अनधिकृत यात्रियों के प्रवेश पर सख्ती से रोक लगाई जाए, नियमित टिकट जांच सुनिश्चित की जाए तथा सुरक्षा, स्वच्छता और समयबद्ध परिचालन व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाए। उनका कहना है कि रेलवे को केवल दावों और विज्ञापनों तक सीमित रहने के बजाय जमीनी स्तर पर सुधारात्मक कदम उठाने होंगे, अन्यथा यात्रियों का भरोसा रेलवे व्यवस्था से पूरी तरह उठ जाएगा।

रेलवे की बदहाल व्यवस्था और जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता का खामियाजा आखिरकार आम यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है। जब आरक्षित डिब्बों में सफर करने वाले यात्रियों को भी सीट, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़े, तो रेलवे के “सुरक्षित और आरामदायक यात्रा” के दावे स्वतः ही कटघरे में खड़े हो जाते हैं।

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