वेदानुकूल जीवन जीने से मानव मात्र का कल्याण संभव-सुधीर बंसल*
गाजियाबाद,वीरवार 22 जनवरी 2026, केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में वेद पौरुषेय हैं अथवा अपौरुषेय विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया।यह कोरोना काल से 757 वाँ वेबिनार था।
वैदिक प्रवक्ता सुधीर बंसल ने इस बात पर बल दिया कि आदि काल,जब से सृष्टि की रचना उस सृजनहार ईश्वर ने की तब कोई भी मनुष्य उपलब्ध नहीं था और न ही कोई अन्य जीव और इसीलिए इस तात्विक सिद्धान्त को स्वीकार करने में कोई दो मत नहीं हो सकते कि वेद के निर्माता स्वयं कोई ब्रह्म शक्ति रही,उसी ने वेदों की रचना की और इसीलिए इन्हें अपौरुषेय के अर्थ में जाना जाता है।वक्ता ने ध्यान दिलवाया कि किसी भी बात को लिखने-जानने के लिए एक भाषा होनी चाहिए और भाषा के लिए एक लिपि उस देश-प्रदेश अनुसार भी होनी चाहिए अन्यथा कैसे बात जानी जायेगी,आगे संप्रेषित होगी?
सृष्टि के प्रारम्भ में ये भौतिकी तो थी नहीं कि कोई लिपि या भाषा होगी अथवा कागज या पर्णादि पर लिखने का कोई प्रचलन होगा,पैन और स्याही आदि बहुत बाद के सृष्टिकाल की देन है जब सभ्यता विकसित होनी शुरू हुई।वैदिक काल गणनानुसार,सृष्टि के निर्माण को लगभग 1,96,08,53,126 वर्ष (196 करोड़ वर्ष) हो चुके हैं।जब शब्द विकास हुआ तो ध्वनि का प्रयोग समझ में आया और शब्द वे होते हैं जिनका कोई अर्थ निकले।

उदाहरण के तौर पर मुर्गा बांग देता है उसे शब्द में प्रचलित हिन्दी भाषा में कर दिया कुकड़ूंकूं।पर मुर्गे की आवाज कुकड़ूंकूं नहीं होती।वो बाद में डारविनिज़्म के अनुसार मनुष्य के निर्माण के बाद और क्रमशः सभ्यता के विकास के साथ कुकड़ूंओ कूं मुर्गे की निकाली ध्वनि को शब्द दे दिया गया आम समझने हेतु। यही ध्वनि फ्रांस में डुडलू डूं शब्द से जानी गई।
उन्होंने इस बात की भी जानकारी दी कि किसी भी वस्तु का निर्माण बिना कारण और प्रयोजन के नहीं होता और इसी प्रसंग में उन्होंने ईश्वरीय विधान में तीन कारण बताये- नैमित्तिक,साधारण और उपादान।हर निर्माण कार्य के पीछे कारण छिपा होगा और आगे उसका प्रयोजन।ईश्वर ने यदि वेदों की रचना की है तो निश्चित ही पहले उसका बड़ा कारण रहा भाषा का विकास और बाद में आध्यात्मिक प्रयोजन और संसार में क्रमशः भौतिक साधनों का विकास बहुत बाद में हुआ पर वेदों के लिए जिसने प्रकृति के साथ पेड़-पौधों और वनस्पति का निर्माण किया, प्रकृति के संतुलन के लिए,सूरज- चांद और नक्षत्र आदि गतिमान किये।तो ये सब अपौरुषेय ही थे तो वेद भी कैसे पौरुषेय होंगे,ये अपने आप में स्वतः सिद्ध हैं और इसके लिए भाषा जो देव वाणी कही जाती है संस्कृत,वह ईश्वरीय वाणी नाम से जाना जाता है,वो विशुद्ध देववाणी जिनसे वेद-मन्त्र प्रदत्त हुए।वेदों के ज्ञान के लिए आदित्य,अग्नि,वायु, और अंगिरा,इन चार ब्रह्म-ऋषियों का उल्लेख भी मिलता है जिनसे वेद को अग्रेसित करने में श्रुति का सहारा इस भौतिक पौरुषेय संसार को बहुत बाद में उपलब्ध हुआ।
फिर काल-दर-काल जब सभ्यता विकसित हुई,संसाधनों का निर्माण और विकास हुआ तब ही पौरुषेय रूप में उन प्रकृति-प्रदत्त वेद-मंत्रों की व्याख्याएं हुईं।लौकिक संस्कृत और व्याकरण के आधार पर विद्वान-मनीषियों द्वारा और छपकर पुस्तकाकार रूप में ये प्रस्तुत किये गये।तब मानुषी ज्ञान भी अमानुषी वैदिक वांड्गमय के आधार पर विकसित होता चला गया जिसका स्वरूप हम पिछले 200 वर्षों में हमारे गुरु ऋषि दयानन्द की देन हुई।आओ आर्यों पुनः वेदों की ओर लौट चलें।
मुख्य अतिथि रजनी गर्ग व अध्यक्ष ओम प्रकाश यजुर्वेदी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।परिषद अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशल संचालन किया व प्रदेश अध्यक्ष प्रवीण आर्य ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
गायिका कौशल्या अरोड़ा,जनक अरोड़ा,कमला हंस,रविन्द्र गुप्ता आदि ने मधुर भजन सुनाए।



