*युवाओं में तेजी से बढ़ रहा डायबिटीज़ का खतरा*
• हर पाँचवां ओपीडी मरीज डायबिटीज़ से पीड़ित, कोविड के बाद बढ़े मामले
• तनाव, गलत खानपान और स्क्रीन टाइम बनी बड़ी वजह
• बच्चों और बड़ों में बढ़ती डायबिटीज़ से निपटने के लिए यथार्थ अस्पताल ने शुरू की ओबेसिटी क्लिनिक
नोएडा, 12 नवम्बर 2025: डायबिटीज़ अब सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि यह तेजी से युवाओं में भी बढ़ रही है। वर्ल्ड डायबिटीज़ डे के मौके पर यथार्थ अस्पताल, नोएडा में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉक्टरों ने बताया कि ओपीडी में आने वाले हर पाँचवें मरीज को डायबिटीज़ की समस्या है। इसमें सबसे बड़ी वजह गलत खानपान, तनाव और कम शारीरिक गतिविधि है।
डॉ. मंजू त्यागी, सीनियर कंसल्टेंट और हेड, इंटर्नल मेडिसिन, यथार्थ अस्पताल नोएडा, ने बताया कि कोविड के बाद डायबिटीज़ के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है। उन्होंने कहा, “कोविड के बाद कई युवाओं में ब्लड शुगर बढ़ा हुआ पाया जा रहा है। कोविड के दौरान शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और पैंक्रियास पर असर पड़ा है। साथ ही तनाव, असंतुलित खानपान और नींद की कमी भी बड़ी वजहें हैं।”
डॉ. प्रखर गर्ग, सीनियर कंसल्टेंट, इंटर्नल मेडिसिन, ने कहा कि दिल्ली-एनसीआर में करीब 25 से 26 प्रतिशत लोग डायबिटीज़ से प्रभावित हैं। उन्होंने कहा, “अब युवाओं और कामकाजी महिलाओं में भी डायबिटीज़ के नए मामले बढ़ रहे हैं। अगर लोग समय-समय पर शुगर टेस्ट और हेल्थ चेकअप करवाएँ, तो बीमारी को शुरुआती दौर में ही कंट्रोल किया जा सकता है।”
डॉ. आशीष गुप्ता, कंसल्टेंट, एंडोक्राइनोलॉजी, ने बताया कि मोटापा और बढ़ता स्क्रीन टाइम अब बड़ी चुनौती बन गए हैं। उन्होंने कहा, “लंबे समय तक मोबाइल या कंप्यूटर पर रहने से शरीर की गतिविधियाँ कम हो जाती हैं, खानपान बिगड़ता है और वजन बढ़ता है। यही मोटापा आगे चलकर डायबिटीज़ का खतरा बढ़ाता है।”
डॉ. पोटलुरी चेतन, कंसल्टेंट, पीडियाट्रिक्स, ने कहा, “आजकल बच्चों में मोटापा बहुत तेजी से बढ़ रहा है और यह कम उम्र में डायबिटीज़ होने की बड़ी वजह बन गया है। ज़्यादातर बच्चे गलत खानपान, शारीरिक गतिविधियों की कमी और ज़्यादा मोबाइल या टीवी देखने के कारण तेजी से मोटे हो रहे हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को बाहर खेलने के लिए प्रेरित करें, मोबाइल और टीवी का समय सीमित करें और पौष्टिक खाना दें, ताकि डायबिटीज़ जैसी बीमारियाँ समय से पहले न हों।”

डॉक्टरों ने बताया कि गर्भवती महिलाओं में डायबिटीज़ के मामले 10 से 14 प्रतिशत तक देखे जा रहे हैं। अगर ब्लड शुगर कंट्रोल में न हो, तो बच्चे पर असर पड़ सकता है या समय से पहले डिलीवरी का खतरा रहता है। वहीं बच्चों में लगभग 1 प्रतिशत डायबिटिक और 15 प्रतिशत प्रीडायबिटिक पाए जा रहे हैं।
डॉ. प्रखर गर्ग ने कहा, “अगर समय रहते डायबिटीज़ की पहचान हो जाए और जीवनशैली सुधारी जाए, तो दवाइयों की ज़रूरत कम पड़ती है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और पर्याप्त नींद ही इसका सबसे अच्छा इलाज है।”
डॉ. मंजू त्यागी ने बताया, “आजकल मोटापा और डायबिटीज़ जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ बहुत बढ़ रही हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए हमने यथार्थ अस्पताल, नोएडा सेक्टर 110 में एक विशेष ओबेसिटी क्लिनिक शुरू की है। यहाँ मरीजों को पूरी जांच, परामर्श और इलाज की सुविधा दी जाएगी, ताकि वे अपना वजन नियंत्रित रख सकें और डायबिटीज़ का खतरा कम कर सकें।”
डॉ. गौतमी ए. वी., सीईओ, यथार्थ अस्पताल नोएडा सेक्टर 110, ने कहा, “यथार्थ अस्पताल में हम डायबिटीज़ के बढ़ते मामलों को लेकर बेहद गंभीर हैं, खासकर बच्चों और युवाओं में। हमारा ध्यान सिर्फ इलाज पर नहीं, बल्कि रोकथाम पर भी है। हम समय-समय पर स्वास्थ्य जांच, परामर्श और जीवनशैली सुधार से जुड़ी जानकारी देते हैं ताकि लोग समय रहते डायबिटीज़ को पहचान सकें और स्वस्थ आदतें अपनाएँ।”
अस्पताल के विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की कि अगर परिवार में डायबिटीज़ का इतिहास हो, तो नियमित रूप से शुगर टेस्ट करवाएँ और लक्षणों को नज़रअंदाज़ न करें।
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