*नई दिल्ली।** चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच 42 पूर्व न्यायाधीशों ने खुला पत्र जारी कर चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिशों पर गंभीर चिंता जताई है। पूर्व न्यायाधीशों ने बिना ठोस सबूत लगाए जा रहे ‘वोट चोरी’ जैसे आरोपों पर भी सवाल उठाए हैं।

खुले पत्र में पूर्व जजों ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें बदनाम करना उचित नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि सार्वजनिक मंचों से संवैधानिक संस्थाओं और चुनाव अधिकारियों को बार-बार ‘चोर’, ‘कठपुतली’ या ‘समझौतावादी’ बताने से लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है।
### SIR प्रक्रिया का किया बचाव
पूर्व न्यायाधीशों ने मतदाता सूची के **स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR)** का भी समर्थन किया। पत्र में इसे मतदाता सूची को साफ, सही और अद्यतन रखने के उद्देश्य से की जाने वाली कानूनी प्रक्रिया बताया गया है। ऑल इंडिया रेडियो की रिपोर्ट के अनुसार, पत्र में SIR को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत वैध प्रक्रिया बताया गया है।
पूर्व जजों ने राजनीतिक दलों से अपील की कि चुनाव संबंधी शिकायतों और आरोपों को स्थापित संवैधानिक एवं कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से उठाया जाए। साथ ही मीडिया से भी बिना जांच-पड़ताल के अटकलों और दावों को प्रसारित नहीं करने की अपील की गई है।
पत्र में कहा गया कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए संवैधानिक संस्थाओं में जनता का विश्वास बनाए रखना आवश्यक है। पूर्व न्यायाधीशों ने संस्थाओं की पारदर्शिता और राजनीतिक विवादों से ऊपर रहकर काम करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
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