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सोनभद्र में माफियाओं का खनन साम्राज्य! पुलिस – खनन – वन विभाग की मिलीभगत से बना अवैध बालू का अड्डा

प्रशासन मौन, अधिकारी गूंगे, बालू माफिया बेलगाम, दिन-रात चल रहा करोड़ों का गोरखधंधा, खतरे में नदियों का अस्तित्व

ब्यूरो चीफ विजय कुमार अग्रहरी/अवधेश कुमार गुप्ता/ समाज जागरण

सोनभद्र। जनपद के विभिन्न थाना क्षेत्रों में प्रशासनिक मिलीभगत से अवैध खनन का धंधा चरम पर है। इस समय सोनभद्र बालू माफियाओं का गढ़ बन चुका है,जहाँ पर दिन- रात भारी मशीनों से बालू निकाली जा रही है। खनन विभाग, पुलिस और प्रशासन — तीनों की आंखों के सामने यह सब कुछ हो रहा है, मगर कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा पसरा है। स्थानीय लोगों ने खुलकर आरोप लगाया है कि अवैध बालू खनन का यह कारोबार ‘ऊपर से नीचे’ तक बटे हुए कमीशन पर चल रहा है। अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतनी बड़ी मात्रा में खनन संभव ही नहीं।


बालू से लदे ट्रक थानों के सामने से गुजरते हैं, नहीं है कोई रोकने वाला!
प्रतिदिन सैकड़ों ट्रक और ट्रैक्टर बालू लादकर निकलते हैं। ये वाहन विभिन्न थाना क्षेत्र एवं चौकी से होकर गुजरते हैं।चौंकाने वाली बात यह है कि इतने बड़े पैमाने पर परिवहन होने के बावजूद किसी गाड़ी को न रोका जाता है, न चालान होता है। स्थानीय जनता सवाल कर रही है — “आखिर कौन है वो अदृश्य हाथ जो इन बालू माफियाओं की ढाल बना हुआ है?”


पैसों का खेल,भ्रष्टाचार की जड़ में बैठा खनन विभाग
खनन विभाग को अवैध खनन की पूरी जानकारी है, फिर भी कोई सख्त कदम नहीं उठाया जा रहा। सूत्रों के मुताबिक, खनन और पुलिस विभाग के बीच मोटी रकम का लेनदेन होता है,जिसके बाद ट्रकों को खुली छूट मिल जाती है। यह पैसा बंदरबांट के रूप में ऊपर तक पहुँचता है, इसलिए किसी को कार्रवाई की हिम्मत नहीं होती।


नदियों का सौंदर्य नष्ट, पर्यावरण पर संकट
अवैध खनन सिर्फ कानून तोड़ना नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सीधा खिलवाड़ है। दिन-रात बालू निकालने से नदी की धाराएं बदल रही हैं, किनारे कट रहे हैं और जलजीव संकट में हैं। गांव के किसानों का कहना है कि “पहले नदी का पानी खेतों तक पहुंचता था, अब सिर्फ गड्ढे और धूल बची है।”


राजस्व को करोड़ों का नुकसान सरकार की नीतियों की उड़ रही धज्जियां इस खनन से प्रदेश सरकार को हर दिन लाखों का राजस्व नुकसान हो रहा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि परमिट से होने वाला वैध खनन बेहद सीमित है, मगर जमीनी हकीकत में अवैध खनन 10 गुना अधिक चल रहा है। ट्रक बिना रॉयल्टी, बिना परमिट सड़कों पर दौड़ रहे हैं, और प्रशासन अपनी आंखें बंद किए बैठा है।


सवाल वही — आखिर किसके संरक्षण में चल रहा यह अवैध कारोबार जब प्रशासन, पुलिस और खनन विभाग को सब कुछ पता है, तब कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या अधिकारी खुद इस गोरखधंधे के हिस्सेदार हैं? या फिर बालू माफिया इतने शक्तिशाली हो चुके हैं कि शासन की पकड़ से बाहर निकल गए हैं? स्थानीय जनता में आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है — “यह सिर्फ अवैध खनन नहीं, बल्कि प्रशासन की नाकामी और भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा उदाहरण है।”


अब जनता पूछ रही है — कब जागेगा सोया हुआ प्रशासन? हर दिन दर्जनों ट्रक बालू से लदे निकलते हैं, लेकिन विभागों की गाड़ियां नहीं निकलतीं। खनन माफिया का यह खेल तब तक नहीं रुकेगा जब तक ऊपर बैठे भ्रष्ट अधिकारियों पर शिकंजा नहीं कसता। लोग मांग कर रहे हैं कि CBI या STF की निगरानी में कार्रवाई की जाए, ताकि इस रैकेट का पर्दाफाश हो सके। सोनभद्र सिर्फ एक जगह नहीं, यह प्रदेश में फैले भ्रष्टाचार की तस्वीर है। प्रशासन की चुप्पी, विभागों की सांठगांठ और माफियाओं की ताकत — तीनों मिलकर कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं। अब जनता का एक ही सवाल है “क्या यूपी में बालू माफिया प्रशासन से ज़्यादा ताकतवर हो गए हैं ?”


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