*विशेष रिपोर्ट : दूरसंचार विभाग और निजी कंपनियों के ‘गठजोड़’ से आम जनता त्रस्त; सीबीआई जांच की उठी मांग*



अनूपपुर (जैतहरी)। आधुनिक भारत में जहां डिजिटल क्रांति के दावे किए जा रहे हैं, वहीं धरात६ल पर उपभोक्ताओं का आर्थिक शोषण एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। अनूपपुर जिले के जैतहरी निवासी समाजसेवी जितेन्द्र सिंह ने प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और संचार मंत्री को पत्र लिखकर भारतीय दूरसंचार विभाग  और निजी मोबाइल कंपनियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी तंत्र को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है। 
BSNL: राष्ट्र का गौरव या सरकारी उपेक्षा का शिकार?
जितेन्द्र सिंह ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि राष्ट्र की आजादी के 75 वर्षों बाद भी दूरसंचार विभाग ग्रामीण अंचलों में बेहतर सेवा देने में विफल रहा है। एक समय में देश की धड़कन माना जाने वाला BSNL आज ‘मृतप्राय’ स्थिति में पहुंच गया है। पत्र में कड़े शब्दों में कहा गया है कि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की लापरवाही और घटिया सेवा राष्ट्र के नाम पर एक ‘कलंक’ की तरह है। उपभोक्ताओं का मानना है कि यदि सरकारी नेटवर्क मजबूत होता, तो निजी कंपनियों को मनमानी टैरिफ बढ़ाने की छूट कभी नहीं मिलती। 


28 दिन का गणित: उपभोक्ताओं की जेब पर सीधी डकैती
समाचार का सबसे ज्वलंत मुद्दा निजी कंपनियों द्वारा लागू किया गया ’28 दिन का महीना’ है। जितेन्द्र सिंह ने तर्क दिया है कि जब पूरी दुनिया में महीना 30 दिन का होता है, तो दूरसंचार कंपनियों के लिए यह 28 दिन का क्यों है? इस दो दिन की कटौती के माध्यम से कंपनियां साल भर में उपभोक्ताओं से एक अतिरिक्त महीने का शुल्क वसूल लेती हैं। उन्होंने इसे उपभोक्ताओं के साथ ‘अंकगणितीय डकैती’ करार दिया है और सरकार से मांग की है कि टैरिफ प्लान अनिवार्य रूप से 30 दिनों का किया जाए। 
ईस्ट इंडिया कंपनी से तुलना: ‘इमोशनल ब्लैकमेलिंग’ का आरोप
पत्र में ‘जियो’ जैसी बड़ी कंपनियों का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि शुरुआत में केवल आधार कार्ड पर मुफ्त सिम बांटकर उपभोक्ताओं को लुभाया गया। सस्ते डेटा का लालच देकर पहले आदत डाली गई और अब बेतहाशा टैरिफ बढ़ाकर आम आदमी को ‘इमोशनल ब्लैकमेलिंग’ का शिकार बनाया जा रहा है। इसकी तुलना ऐतिहासिक ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ से करते हुए कहा गया है कि ये कंपनियां भी उसी तरह व्यापार फैलाकर भोले-भाले उपभोक्ताओं को अपने मकड़जाल में फंसा रही हैं। 
मंत्री की नियुक्ति से थी उम्मीद, पर हाथ लगी निराशा
जब श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संचार मंत्री का पदभार संभाला था, तब देश के करोड़ों उपभोक्ताओं को उम्मीद थी कि दूरसंचार व्यवस्था में सुधार होगा और निजी कंपनियों की मनमानी पर लगाम लगेगी। हालांकि, उपभोक्ताओं का कहना है कि उनकी मंशा धराशायी हो गई है। पत्र में सवाल उठाया गया है कि क्या निजी कंपनियां सरकार से भी अधिक शक्तिशाली हो गई हैं? 
प्रमुख मांगें और भविष्य की चेतावनी
जितेन्द्र सिंह ने अपने पत्र के अंत में कुछ ठोस मांगें रखी हैं:
सीबीआई जांच: दूरसंचार विभाग के अधिकारियों की कथित मिलीभगत और घटिया कार्यप्रणाली की उच्च स्तरीय सीबीआई जांच हो। 
टास्क फोर्स का गठन: निजी कंपनियों के टैरिफ पर नियंत्रण के लिए एक विशेष टास्क फोर्स बनाई जाए। 
टैरिफ अवधि में सुधार: रिचार्ज पैक की वैधता को 28 दिन से बढ़ाकर 30 दिन किया जाए। 
BSNL का सुदृढ़ीकरण सरकारी नेटवर्क को पुनर्जीवित किया जाए ताकि प्रतिस्पर्धा बनी रहे।

*आज मोबाइल फोन किसी विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि गरीब, मजदूर, किसान और हर वर्ग की मूलभूत आवश्यकता बन चुका है। ऐसे में दूरसंचार क्षेत्र में व्याप्त यह ‘अराजकता’ देश के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार इस गंभीर शिकायत पर क्या संज्ञान लेती है।*

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