किशनगंज: जिले की जीविका दीदियों के लिए मछलीपालन अब आत्मनिर्भरता और आर्थिक मजबूती का बड़ा माध्यम बनता जा रहा है। पारंपरिक रूप से मछली पालन से जुड़ी महिलाओं के साथ-साथ अब अन्य जीविका दीदियां भी इस व्यवसाय से जुड़कर अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं।
शुक्रवार को कोचाधामन प्रखंड के दो तालाबों में जीविका दीदियों द्वारा मछली का बीज डाला गया। तालाबों में रोहू, कतला और ग्रास कार्प प्रजाति की मछलियों के बीज छोड़े गए। इस दौरान महिलाओं में खासा उत्साह देखने को मिला।
जीविका की डीपीएम अनुराधा चंद्रा ने बताया कि किशनगंज जिले में जीविका के माध्यम से कुल चार तालाबों में मछली पालन किया जा रहा है। इनमें कोचाधामन प्रखंड में दो तालाब, जबकि दिघलबैंक और बहादुरगंज प्रखंड में एक-एक तालाब शामिल हैं। उन्होंने बताया कि जल-जीवन-हरियाली अभियान के तहत संचालित इन तालाबों में जीविका दीदियां पूरी जिम्मेदारी के साथ मत्स्य पालन कर रही हैं।
उन्होंने जानकारी दी कि अब तक 2,264 किलोग्राम मछली की बिक्री से करीब 3.30 लाख रुपये की आय प्राप्त हो चुकी है। इन चारों तालाबों से 15 जीविका दीदियां प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई हैं। सभी महिलाएं जीविका मत्स्य उत्पादक समूह की सदस्य हैं और मछली पालन से जुड़े सभी कार्य स्वयं संचालित कर रही हैं।
जीविका मत्स्य उत्पादक समूह के माध्यम से सरकारी तालाबों का बेहतर रखरखाव भी हो रहा है। वहीं महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिल रहा है। जीविका किशनगंज में पदस्थापित युवा पेशेवर ऋषभ प्रसाद और प्रेम शंकर तकनीकी सहयोग देकर महिलाओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
समेकित मछली पालन के तहत तालाब की मेड़ पर सब्जियों की खेती भी की जा रही है, जिससे अतिरिक्त आय का स्रोत तैयार हो रहा है। कोचाधामन प्रखंड के राजधानी जीविका महिला उत्पादक समूह द्वारा संचालित तालाब से अब तक 510 किलोग्राम मछली उत्पादन कर लगभग 79 हजार रुपये की आय हुई है। वहीं क्रांति मत्स्य उत्पादक समूह द्वारा संचालित तालाब से 674 किलोग्राम मछली उत्पादन कर 94 हजार रुपये से अधिक का कारोबार किया गया है।
किशनगंज जिले में पहली बार जीविका दीदियों ने संगठित रूप से मत्स्य पालन की शुरुआत की है। शुरुआती सफलता से महिलाओं का उत्साह बढ़ा है और वे भविष्य में इसे और बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं।
मछली पालन के लिए चयनित तालाबों की सफाई और तैयारी वैज्ञानिक तरीके से की जाती है। तालाबों में गोबर और चुना डालकर पानी को स्वच्छ बनाया जाता है। मछली का बीज डालने, चारा प्रबंधन और बिक्री तक की पूरी प्रक्रिया में जीविका दीदियां सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। इससे उनका कौशल विकास भी हो रहा है और वे मत्स्य पालन की बारीकियों को बेहतर तरीके से समझ रही हैं।
मत्स्य पालन से जुड़े लेखा-जोखा का कार्य “मत्स्य सखी” के माध्यम से किया जा रहा है। इसके लिए महिलाओं को फिशरी रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर, मीठापुर में विशेष प्रशिक्षण दिया गया है, जिससे उनकी कार्यक्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
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