प्रकृति के बचाव के लिए लोगों में चेतना एवं नवजागरण
धनबाद (झारखण्ड):- प्रकृति की गोद में बसा हुआ झारखंड लोगों की उपेक्षा से आज जंगल , नदियाँ और पहाड़ , जिससे यहां की सुंदरता- सुषमा हिलोरे लिया करती थी , आज अपनी उपेक्षा से आठ -आठ आंसूए बहा रही है , आज इस धरती के लिए “विज्ञान वरदान नहीं अभिशाप बनकर खड़ी है ” । जीवन दायिनी नदियां अपनी अस्मिता खोती जा रही है , जो पहले यहां के लोगों के लिए जीवनदायिनी थी आज स्वयं जीवन की याचना कर रही हैं।
कतरी नदी के नाम पर पढ़ा था शहर का नाम कतरासगढ़
“जल ही जीवन है और जीवन की धारा को यही जलधारा आगे बढ़ाती है ” । कचरी नदी जो धनबाद की सबसे बड़ी नदी है जिसे यहां के लोगों के लिए यह जीवन रेखा कही जाती थी पूरे कतरास एवं आसपास के लोगों के लिए जीवन रेखा एवं जीवन वरदान देने का काम करती थी बताते चलें कि कतरी नदी तोपचांची से बहते हुए कतरास होते हुए धनबाद जिले के भटिंडा फॉल में आकर मिलती है । यह नदी जो लोगों के लिए प्राण – दायनी थी , आज वह स्वयं अपने प्राण के लिए बिलख रही है , लोगों के द्वारा उपेक्षा के कारण जो नदी यहां आत्मा थी वह स्वयं विलुप्त के कगार पर खड़ी हो गई है और लोगों से यह आस लगाए बैठी है कि कोई आए और मेरा भी उद्धार कर दे।
आउटसोर्सिंग कंपनियों ने नदी एवं पहाड़ के रूपरेखा को उजाड़ दिया
आउटसोर्सिंग कंपनियां प्रकृति जंगल, मिट्टी एवं पहाड़ की उपेक्षा कर जैसे – तैसे कोयले निकाल रही हैं और कोयले निकालने का जो मानदंड है उसका वे घोर उपेक्षा करते हैं उसी का दुष्परिणाम है कि आज जंगल पहाड़ एवं नदियां अपनी अस्मिता खो बैठी हैं । जो क्षेत्र अपनी हरियाली और सुंदरता के लिए जानी जाती थी जिसे देख कर लो मंत्रमुग्ध हो जाते थे, आज वहां गंदगी का अंबार लगा हुआ है तथा जगह जगह कोयले का डंप दिखाई देता है । जंगल नदियां पहाड़ विलुप्त होते जा रहे हैं ।
मनुष्य अपने क्रियाकलापों के पूर्ति हेतु नदी को पहुंचाई अंत के कगार पर
मानव सिर्फ अपनी इच्छाओं की तत्कालिक पूर्ति करना चाहता है और भविष्य की ओर देखता ही नहीं है परिणाम सामने है की , जो वसुधा लोगों के लिए प्राणवायु प्रदान करती थी , लोगों के उपेक्षा के कारण आज वह स्वयं अंत के कगार पर हैं।
लोगों में हैं प्रकृति के प्रति नवजागरण एवं नवचेतना लाने की आवश्यकता
आदि युग से ही प्रकृति जीवो की पालना रही है, वह अपने गोद में रखकर जीवो को पालती है और दूसरे को जीवन देने के लिए ही अपना सर्वत्र न्योछावर करती है परंतु मनुष्य अपनी इच्छाओं के वशीभूत होकर जो जीवन देने वाली प्रकृति है उसे ही विनाश के कगार पर पहुंचा दिया है अतः समाज के गणमान्य लोगों से अनुरोध है कि वह इसके लिए अपना कदम आगे बढ़ाएं तथा मोदी जी के ” स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत ” के सपने को साकार करें और प्रकृति को नए वरदान देकर पुण: जीव जंतुओं का संरक्षण करें और नदी जंगल और पहाड़ को जीवित करें ।
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