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शुभ कर्मों का फल है मानव जीवन-विधानिधि आर्य

समाज जागरण
गोड्डा

र्मेहरमा ईश्वर,जीव और प्रकृति तीनों अनादी सत्ता है। मूल प्रकृति से संसार की रचना हुई है। इसमें रजो,तमो और सतो गुण समाया हुआ है। जीवात्मा का नाश नहीं होता है, कर्मों के अनुसार वह शरीर धारण करता है। यह बातें आर्य समाज के वैदिक पुरोहित विद्यानिधि आर्य ने रविवार आर्य समाज मंदिर चपरी में सार्वजनिक रूप से आयोजित साप्ताहिक वैदिक हवन यज्ञ और प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतंत्र और फल पाने के लिए परतंत्र है। परमात्मा अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं। जो ईश्वर की व्यवस्था को समझता है, वह बुरा कर्म नहीं करता है।

कहा कि मनुष्य सुख प्राप्त करना चाहता है,जबकि उसका लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति होना चाहिए। इसके लिए उसे अध्यात्मिक विद्या को समझना और जीवन में अच्छे कर्म करना होता है।कहा कि भौतिक जीवन से हजार गुना अधिक लाभ आध्यात्मिक जीवन से मिलता है। अगला जीवन भी ठीक-ठीक हो, इसलिए मनुष्य को सभी शुभ काम करने पड़ते हैं। दिनचर्या भी ठीक करना पड़ता है। प्रत्येक दिन सुबह और शाम संध्या अर्थात ब्रह्म यज्ञ, ईश्वर स्तुति प्रर्थना उपासना करने पर बल दिया।

कहा कि यज्ञ हमारा सबसे श्रेष्ठ पूजा पद्धति है।कहा कि मनुष्य का भोजन खाद्य पदार्थ जबकि जीवात्मा का भजन ज्ञान और आनंद है। कार्यक्रम का समापन शांति पाठ परमेश्वर के नाम ओउम् की ध्वनि से किया गया।इस अवसर पर सुबोध कुमार आर्य, खुशबू कुमारी, प्रगति आर्या,सृष्टि आर्या, धनेश्वर प्रसाद,पत्रकार अनिल आनंद, नकुल साह, जिछेन्द्र साह, राजकुमार साह सहित अन्य उपस्थित थे।

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